
मुंबई। दर्द भरे नगमों के बादशाह मुकेश ने मांट्रियल कनाडा में 1976 में हो रहे एक म्यूजिक कन्सर्ट के दौरान शायद यह महसूस कर लिया था कि मौत उनके काफी करीब है। इसीलिए अमेरिका में छुट्टियां मना रहे अपने पुत्र नितिन मुकेश को उन्होंने वहां बुला लिया था।
कन्सर्ट में अंतिम कार्यक्रम के रूप में अपना पसंदीदा गीत 'जाने कहां गए वो दिन..' पेश करने से पहले मुकेश ने मंच से नितिन को इस गीत में साथ देने की घोषणा की। सुरों के उतार-चढ़ाव से परिपूर्ण इस गाने का मुखड़ा मुकेश ने बड़ी ही तबीयत से गाया लेकिन पहले ही अंतरे के बाद वे रूक गए और उनके संकेत कोसमझकर गीत के आगे की कड़ी नितिन ने पूरी की। उसी समय नितिन को यह आभास हो गया कि अब आगे की जिम्मेदारी उठाने का समय आ चुका है। इस कन्सर्ट के ठीक चार दिन बाद 27 अगस्त 1976 को मुकेश को अमेरिका में दिल का दौरा पड़ा और वह दुनिया के संगीत प्रेमियों को अपने प्यारे गीत ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना की स्वर लहरियों में छोड़ कर सदा के लिए अलविदा कह गए।
दर्द भरे नगमों के बेताज बादशाह मुकेश चंद्र माथुर उर्फ मुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन के दिनों में के एल सहगल से प्रभावित रहने के कारण मुकेश उन्हीं की तरह गायक कलाकार बनना चाहते थे। हिंदी फिल्मों के जाने-माने अभिनेता मोतीलाल ने मुकेश की बहन की शादी में उनके गानों को सुना। उनकी आवाज से मोतीलाल इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मुकेश को मुंबई बुला लिया। मोतीलाल मुकेश के दूर के रिश्तेदार भी थे। फिल्मों में कदम रखने के पहले मुकेश पीडब्लूडी में एक सहायक के रूप में काम करते थे। वर्ष 1940 में एक अभिनेता बनने की चाह लिए उन्होंने मुंबई का रुख किया। मोतीलाल ने मुकेश को अपने घर में ही रखकर उनके लिए संगीत की शिक्षा की व्यवस्था की और वह पंडित जगन्नाथ प्रसाद से संगीत की शिक्षा लेने लगे।
इन सबके बीच मुकेश को बतौर अभिनेता वर्ष 1941 में प्रदर्शित फिल्म निर्दोष में काम करने का मौका मिला। अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन में मुकेश को अपना पहला गाना दिल जलता है तो जलने दे वर्ष 1945 में प्रदर्शित फिल्म पहली नजर के लिए गाया। इसे महज एक संयोग कहा जाए कि यह गाना अभिनेता मोतीलाल पर ही फिल्माया गया। फि ल्म की कामयाबी के बाद मुकेश रातों रात गायक कलाकार के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए।
मुकेश के दिल में यह ख्वाहिश थी कि वह गायक के साथ अभिनेता के रूप में भी अपनी पहचान बनाएं। वर्ष 1951 में प्रदर्शित फिल्म आवारा की कामयाबी के बाद उन्होंने गायकी के साथ ही अभिनेता बनने की ओर कदम बढ़ाया। वर्ष 1958 में फिल्म यहूदी के गाने ये मेरा दीवानापन है गाने की कामयाबी के बाद मुकेश को एक बार फिर से बतौर गायक अपनी पहचान मिली। इसके बाद मुकेश ने एक से बढ़कर एक गीत गाकर श्रोताओ को भाव विभोर कर दिया। मुकेश ने अपने तीन दशक के सिने कैरियर में 200 से भी ज्यादा फिल्मों के लिए गीत गाए। मुकेश को उनके गाए गीतों के लिए चार बार फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
मुकेश को सबसे पहले वर्ष 1959 में प्रदर्शित फिल्म अनाड़ी के सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके बाद वर्ष 1970 में प्रदर्शित पहचान के गाने सबसे बड़ा नादान वर्ष 1972 में फिल्म बेईमान के गाने जय बोलो बेईमान की गाने और वर्ष 1976 में प्रदर्शित फिल्म कभी कभी के गाने कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है के लिए भी मुकेश सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। इसके अलावा वर्ष 1974 में प्रदर्शित रजनीगंधा के गाने कई बार यूहीं देखा के लिए मुकेश नेशनल अवार्ड से भी सम्मानित किए गए।
मुकेश के पसंदीदा संगीत निर्देशक के तौर पर शंकर जयकिशन का और गीतकार में शैलेंद्र का नाम सबसे पहले आता है। वर्ष 1949 में प्रदर्शित फिल्म बरसात से मुकेश, शैलेंद्र और शंकर जयकिशन की जोड़ी वाली पहली हिट फिल्म थ॥ इसके बाद वर्ष 1951 में फिल्म आवारा की कामयाबी के पश्चात पश्चात मुकेश, शैलेंद्र और शंकर जयकिशन की जोड़ी के गीत-संगीत से श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। वर्ष 1941 में बतौर अभिनेता फिल्म निर्दोष से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले मुकेश बतौर अभिनेता सफल नहीं हो सके। उन्होंने बतौर अभिनेता दुख-सुख , आदाब अर्ज , माशूका (1953), आह (1953), आक्रमण (1956), दुल्हन (1974) फिल्में की। बतौर निर्माता मुकेश ने वर्ष 1951 मे मल्हार और वर्ष 1956 में आक्रमण फिल्में भी बनाई इसके साथ ही इसी फिल्म के लिए उन्होंने संगीत भी दिया। यूं तो मुकेश ने दिलीप कुमार, राजेंद्र कुमार, शम्मी कपूर, राजेश खन्ना से लेकर राजकुमार तक के लिए गाने गाए, लेकिन राजकपूर और मनोज कुमार पर मुकेश की आवाज खूब जमती थी, साथ हीं राजकपूर और मनोज कुमार भी अपनी फिल्मों के लिए मुकेश द्वारा गाए जाने की मांग किया करते थे।
26 अगस्त 1976 को राज कपूर की फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम के गाने चंचल निर्मल शीतल की रिकार्डिग पूरी करने के बाद मुकेश अमेरिका में हो रहे कन्सर्ट में भाग लेने के लिए गए गए। इसके ठीक अगले दिन 27 अगस्त 1976 को मिशागिन-अमेरिका मे दिल का दौरा पड़ा और वह अपने करोड़ों प्रशंसकों को छोड़ सदा के लिए चले गए। इसके बाद जब उनके पार्थिव शरीर को भारत लाया गया। जैसे ही राजकपूर को उनके मरने की खबर मिली वह मुकेश कीअंतिम यात्रा में भाग लेने पहुंचे जहां उन्होंने कहा कि मुकेश के जाने के बाद ऐसा लगता है कि जैसे मेरी आवाज और आत्मा दोनों ही चली गई है।