जेल में गीता मांगी थी भगत सिंह ने

नई दिल्ली [सतेंद्र सिंह]। आप जानते होंगे कि भगत सिंह ने मा‌र्क्स, लेनिन, बुकानिन आदि को पढ़ा था। पर क्या उन्होंने गीता भी पढ़ी थी? ऐसा समझा जा सकता है कि उन्होंने अपने बंदी जीवन के दौरान गीता पढ़ी थी।

बात अप्रैल 1929 की है, जब भगत सिंह ने जेल जाने के कुछ ही दिनों के भीतर गीता की मांग की थी। 8 अप्रैल को नेशनल असेंबली में बम फेंकने के मामले में भगत सिंह को गिरफ्तार कर दिल्ली में जेल में डाल दिया गया था। यहीं पर रहते हुए उन्होंने गीता मांगी थी। इस आशय की खबर 30 अप्रैल 1929 को लाहौर से प्रकाशित होने वाले तत्कालीन अंग्रेजी दैनिक 'द ट्रिब्यून' के पृष्ठ संख्या नौ पर छपी थी। 27 अप्रैल को दिल्ली से लिखी गई खबर का शीर्षक था 'एस. भगत सिंह वांट्स गीता'। रिपोर्ट में लिखा गया था, 'ऐसी रिपोर्ट है कि सरदार भगत सिंह ने अपने पिता को नेपोलियन की जीवनी और लोकमान्य तिलक की गीता की प्रति भेजने के लिए लिखा है।'

यहां एक और तथ्य विचार करने योग्य है। पंजाब के नवांशहर के खटकड़ कलां स्थित शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह संग्रहालय में एक गीता रखी हुई है। उसके कवर पेज पर 'भगत सिंह, सेंट्रल जेल, लाहौर' लिखा हुआ है। लेकिन यह तिलक की गीता नहीं है, बल्कि पं. नृसिंहदेव शास्त्री के भाष्य वाली गीता है, जो आर्य बुक डिपो लाहौर से प्रकाशित है। इस पर किसी पुस्तकालय की मुहर नहीं है। संभव है उनके किसी परिजन ने उसे उनके पास पहुंचाया हो। कवर पेज पर लिखावट भगत सिंह की है या नहीं, इस पर विशेषज्ञों में मतभेद है।

भगत सिंह को तिलक की गीता उपलब्ध कराने के पक्ष में अभी तक कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया है। भगत सिंह पर शोधरत व जेएनयू के ख्याति प्राप्त मा‌र्क्सवादी विद्वान प्रो. चमन लाल कहते हैं कि संभव है तिलक की गीता न मिली हो और बाजार में जो गीता मिली, उसे ही उनके पास पहुंचा दिया गया होगा। लेकिन इन्हें संशय है कि उन्होंने गीता पढ़ी होगी; क्योंकि भगत सिंह जेल में जो कुछ पढ़ते थे, उसे अपनी जेल डायरी में नोट करते थे और उनकी जेल डायरी में गीता का कोई संदर्भ नहीं मिलता। पर क्या जेल डायरी में वे सब कुछ नोट करते ही थे, इस सवाल पर प्रो. चमन लाल जरूर कुछ छूट देते हैं। पर साथ ही उनका यह भी कहना है कि अगर उन्होंने जेल में गीता पढ़ी भी होगी, तो उसमें उनको कुछ महत्वपूर्ण नहीं लगा होगा; क्योंकि जेल डायरी में उससे कोई नोट नहीं मिलता। वैसे भी उनके द्वारा तिलक जैसे राष्ट्रवादी नेता की गीता मांगने का मकसद धार्मिक नहीं, राजनीतिक रहा होगा।

इस संदर्भ में जाने-माने इतिहासकार प्रो. के सी यादव प्रो. चमन लाल से सहमत नजर नहीं आते। उनके अनुसार यह बात कोई मायने नहीं रखती कि जेल डायरी में गीता की चर्चा नहीं है, क्योंकि कोई जरूरी नहीं कि उसमें वे हर किताब की चर्चा करें ही। उसमें गीता का उल्लेख न होने से उसकी महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। महत्वपूर्ण बात है उनके द्वारा बंदी जीवन के दौरान गीता पढ़ने की इच्छा व्यक्त करना। इसे हल्के ढंग से नहीं लिया जा सकता, क्योंकि गीता तत्कालीन क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा स्रोत रही है, उन्हें दार्शनिक आधार प्रदान करती रही है। गीता का कर्मवाद उन्हें मानसिक शांति व शक्ति प्रदान करता रहा है।

प्रो. यादव के मुताबिक भगत सिंह की जिंदगी में गीता की भूमिका समझने के लिए उनकी विचार निर्माण प्रक्रिया के विकास को समझना होगा। दरअसल, वे पूरी जिंदगी विचार निर्माण की प्रक्रिया से गुजरे। अगर वे और अधिक समय तक जीवित रहते, तो उनकी यह विचार प्रक्रिया कहां पर जाकर रुकती, कहना कठिन है। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि आर्य समाजी थी। अपनी 23 साल की जिंदगी में समाजवाद की दहलीज तक पहुंचने से पहले वे बब्बर अकाली, आयरिश व रूसी क्रांतिकारियों और देशी क्रांतिकारियों की गलियों से गुजर चुके थे। यह सही है कि वे मा‌र्क्सवाद और समाजवाद में पूरी तरह से रुचि रखते थे और उससे प्रभावित थे। वे रूसी क्रांति के पैटर्न पर भारत में बदलाव भी चाहते थे। लेकिन यह कहना कि वे पूरी तरह कम्युनिस्ट थे, बिल्कुल गलत है। वे जो कुछ भी थे, यथार्थवादी थे। अगर वे कम्युनिस्ट या समाजवादी थे, तो अपनी ही किस्म के कम्युनिस्ट या समाजवादी थे।

बहरहाल, भगत सिंह को यह ग्लानि थी कि उन्हें भारतीय साहित्य पढ़ने के लिए समय नहीं मिला। लेकिन ऐसा माना जा सकता है कि भगत सिंह ने गीता पढ़ी होगी। इस बात की पूरी गुंजाइश है कि उनके पास जेल में गीता पहुंचाई गई होगी, चाहे वह दिल्ली में पहुंचाई गई हो या लाहौर में। मालूम हो कि कुछ ही दिनों में दिल्ली केस के फैसले के बाद उनको सांडर्स केस के लिए लाहौर जेल भेज दिया गया था। भगत सिंह की फांसी के बाद उनके सामान को उनके परिजनों को सौंप दिया गया होगा। उसी में यह गीता मिली होगी। सवाल उठता है कि विद्वानों का ध्यान अभी तक इस ओर क्यों नहीं गया?




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