भगत सिंह को नहीं मारी गई थी गोली

 
Mar 23, 04:04 pm

नई दिल्ली। हाल ही में कुछ लेखकों द्वारा भगत सिंह की फांसी से जुड़े घटनाक्रम के बारे में यह कहा गया कि लाहौर सेंट्रल जेल के अधिकारियों ने शहीद-ए-आजम के अंतिम सांस लेने से पहले ही उन्हें फंदे से उतार लिया था और फिर उन्हें गोली मार दी गई थी, लेकिन तत्कालीन जेल अधीक्षक द्वारा दर्ज टिप्पणी इस बात का खंडन करती है।

हाल ही में एक लेखक ने यह भी कहा था कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की मृत्यु से पहले ही आजादी के इन मतवालों को फांसी के फंदे से उतार लिया गया था और फिर जेल अधिकारियों के आदेश पर उन्हें गोली मार दी गई थी।

एक लेखक ने यह भी कहा था कि भगत सिंह को जेल में फांसी के फंदे के बाद सांडर्स की प्रेमिका ने गोली मार दी थी। दूसरी ओर, शहीद-ए-आजम के घनिष्ठ मित्र और लाहौर षड्यंत्र मामले [सांडर्स की हत्या] में उम्रकैद की सजा पाने वाले क्रांतिकारी शिव वर्मा द्वारा संपादित किताब विवाद खड़ा करने वाले लेखकों के दावों का खंडन करती है।

भगत सिंह पर लिखी गई शिव वर्मा द्वारा संपादित किताब में लाहौर षड्यंत्र मामले में सात अक्टूबर 1930 को विशेष न्यायाधिकरण और 26 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल के अधीक्षक द्वारा जारी किए गए फांसी से संबंधित वारंटों का जिक्र किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि क्रांतिकारियों को फांसी के फंदे से उतारकर गोली नहीं मारी गई थी।

जेल अधीक्षक द्वारा जारी वारंट में लिखा है कि मैं यह प्रमाणित करता हूं कि 23 मार्च 1931 को शाम सात बजे लाहौर सेंट्रल जेल में राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह को फांसी दे दी गई। उनके शरीर फंदे से लगभग एक घंटे तक लटके रहे। उन्हें तब तक नीचे नहीं उतारा गया जब तक डाक्टर ने उन्हें मृत घोषित नहीं कर दिया।

नास्तिक नहीं मानता परिवार

-भगत सिंह का परिवार उन्हें नास्तिक नहीं मानता। परिवार के सदस्यों का कहना है कि शहीद-ए-आजम अंधविश्वास और भगवान तथा किस्मत के नाम पर लोगों के अकर्मण्य बन जाने के विरोधी थे, लेकिन नास्तिक नहीं थे।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह द्वारा लाहौर सेंट्रल जेल में लिखी गई डायरी में उर्दू में लिखी कुछ पंक्तियों से भी इस बात का अहसास होता है कि भगत सिंह कई मौकों पर भगवान के अस्तित्व को बेशक नकारते रहे हों, लेकिन वह नास्तिक नहीं थे।

शहीद-ए-आजम के पौत्र [भतीजे बाबर सिंह संधु के पुत्र] यादविंदर सिंह संधु ने कहा कि उनका परिवार हमेशा से आर्य समाजी रहा है। उनके दादा भगत सिंह भगवान, किस्मत तथा कर्मो के फल के नाम पर लोगों के अकर्मण्य बन जाने के खिलाफ थे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह नास्तिक थे।

उन्होंने बताया कि भगत सिंह को जब फांसी के लिए ले जाया जा रहा था तो लाहौर सेंट्रल जेल के वार्डन सरदार चतर सिंह ने उनसे अंतिम समय भगवान को याद करने को कहा। इस पर भगत सिंह ने जवाब दिया कि सारी जिंदगी दुखियों और गरीबों के कष्ट देखकर मैं भगवान को कोसता रहा, लेकिन अब यदि उन्हें याद करूंगा तो वह मुझे बुजदिल समझेंगे और कहेंगे कि यह मौत से डर गया।

भगत सिंह द्वारा लाहौर सेंट्रल जेल में लिखी गई 404 पृष्ठ की डायरी के कुछ पन्नों पर लिखी उर्दू पंक्तियों से भी यह अहसास होता है कि भगत सिंह नास्तिक नहीं थे। डायरी के पेज नंबर 124 पर भगत सिंह ने लिखा है.. दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे, जो गम की घड़ी को भी खुशी से गुलजार कर दे। इसी पेज पर भगत सिंह ने यह भी लिखा है..छेड़ ना फरिश्ते तू जिक्र ए गम, क्यों याद दिलाते हो भूला हुआ अफसाना।

इस मूल डायरी की प्रति और माइक्रो फिल्म दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी है। डायरी के पेज नंबर 124 पर भगत सिंह ने स्प्रिच्युअल डेमोक्रेसी शब्द का भी इस्तेमाल किया है।

कभी नहीं पहनी पीले रंग की पगड़ी

-भगत सिंह से संबंधित घटनाओं पर शोध करने वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चमनलाल का कहना है कि जिस तरह से तस्वीरों में भगत सिंह को पीली पगड़ी पहने और हाथ में पिस्तौल लिए दिखाया जाता है, वह उनके विहंगम व्यक्तित्व से कहीं मेल नहीं खाती।

चमनलाल ने कहा कि उन्होंने अब तक जितना भी शोध कार्य किया है, उसमें ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला है, जिससे यह साबित हो सके कि भगत सिंह ने युवावस्था में कभी पीले रंग की पगड़ी पहनी।

चमनलाल ने कहा कि भगत सिंह की अब तक चार विभिन्न प्रकार की तस्वीरें सामने आई हैं। जिस तस्वीर में शहीद-ए-आजम सिर पर टोपी पहने दिखाई देते हैं, वह उनकी अंतिम तस्वीर है। उनके अनुसार भगत सिंह ने यह तस्वीर गोरी हुकूमत के पब्लिक सेफ्टी और ट्रेड डिस्प्यूट बिल के विरोध में केंद्रीय असेंबली [वर्तमान संसद भवन] में बम फेंकने से पहले खिंचवाई थी।

यह फोटो दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित एक स्टूडियो में खींची गई थी। चमनलाल का कहना है कि भारतीय जनमानस और यहां तक कि पाकिस्तान में भी शहीद-ए-आजम का यही फोटो सर्वाधिक लोकप्रिय है। कहना है कि भगत सिंह की यह अंतिम फोटो उस समय की है, जब वह 21 साल के थे। तीन अन्य तस्वीरों में से एक में भगत सिंह लाहौर में पुलिस हिरासत में एक चारपाई पर बैठे दिखाई देते हैं। भगत सिंह की यह तस्वीर मई 1927 में उस समय खींची गई जब वह 20 साल के थे। इस फोटो में भगत सिंह के हाथों में हथकड़ी है और उन्होंने सिर पर पगड़ी नहीं पहन रखी है।

इससे पहले भगत सिंह की एक तस्वीर नेशनल कालेज लाहौर की है, जिसमें वह 17 साल की उम्र में नाटक समूह के साथ कुर्ता-पायजामा और सफेद पगड़ी में दिखाई देते हैं। भगत सिंह की सबसे पहली तस्वीर उस समय की है जब वह 11 साल के थे। यह तस्वीर संभवत: उनके लायलपुर स्थित घर में खींची गई।




लेख को दर्जा दें

दर्जा दें

0 out of 5 blips

(122) वोट का औसत

average:4.852458
Saving...
    शीर्षकों को अपने "मेरा याहू " पृष्ट पर शामिल करें
  • राजनीति
    Add to My Yahoo! xml
  • अपराध
    Add to My Yahoo! xml
  • दुर्घटना
    Add to My Yahoo! xml
  • आतंकवाद
    Add to My Yahoo! xml
इस पृष्ठ की सामग्री जागरण द्वारा प्रदान की गई है
कॉपीराइट © 2008 याहू वेब सर्विसेज़ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड सर्वाधिकार सुरक्षित