
नई दिल्ली। मुस्लिम समाज ने सिर्फ बालिगों को ही यौन शिक्षा दिए जाने की वकालत की है। भारतीय इस्लामी फिकह अकादमी की गोष्ठी में देश भर के प्रमुख उलेमाओं ने ऐसी ही राय पेश की। उन्होंने नाबालिगों को यौन शिक्षा देने संबंधी केंद्र सरकार के मंसूबे पर गुस्से का इजहार किया।
फिकह अकादमी के फैसले मुस्लिम समाज में अहम मुकाम रखते हैं। इस अकादमी से देश की तमाम प्रमुख मुस्लिम संस्थाएं और सैकड़ों छोटे-बड़े मदरसे व उनके शिक्षक जुड़े हुए हैं। हाल ही में अकादमी की 17वीं गोष्ठी हुई थी। इसमें प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं में यौन शिक्षा शुरू करने के केंद्र सरकार के मंसूबे का कड़ा विरोध किया गया। उलेमाओं का कहना था- यह इस्लाम ही नहीं, हिंदू धर्म के नैतिक मूल्यों के भी खिलाफ है।
अकादमी के मुख्य मुफ्ती अहमद नादिर अल काजिम का कहना था-इस्लाम यौन शिक्षा के खिलाफ नहीं है। इस्लामी मदरसों में यह शिक्षा दी जाती है। लेकिन सिर्फ बालिगों को। मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों के बालिग होने के बाद उन्हें पाकी-नापाकी और शौहर-बीवी के रिश्तों की तालीम के तहत एहतियात वाली सभी बातें बताई जाती हैं। मुख्य मुफ्ती ने कहा कि प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के बजाय 14 साल की उम्र पार कर चुके छात्रों को यौन शिक्षा देने पर हमें कोई आपत्तिनहीं है।
गोष्ठी में कहा गया कि शुरुआती कक्षा के छात्रों को यौन शिक्षा देने का केंद्र सरकार का मंसूबा पश्चिमी एजेंडे को मान लेने के बराबर है। गोष्ठी में उलेमाओं का मशविरा था कि यौन शिक्षा के बजाय सभी धर्मो की नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।