नहीं फलेगी दूधो नहाओ की आशीष

 
May 08, 12:06 pm

आगरा, जागरण संवाददाता। दूधो नहाओ का आशीष अब फलित नहीं हो पाएगा। आश्चर्य नहीं होना चाहिए, अगर पांच साल बाद दूध 100 रुपये लीटर मिले। हालात तो इसी ओर इशारा कर रहे है। 100 करोड़ से भी अधिक आबादी वाले देश में अब करीब 16 करोड़ पशु बचे है। इस पर भी कत्लगाहों की संख्या सिमटने के बजाए लगातार बढ़ रही है। अगर सिंथेटिक मिल्क बिकना बंद हो जाए तो दूध अभी से सोने के मोल मिलने लगेगा।

केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ एनीमल हसबेंडरी के आंकड़ों के मुताबिक 1951 में 40 करोड़ जनसंख्या पर 15 करोड़ 53 लाख पशु थे। 1992 में करीब 93 करोड़ जनसंख्या पर पशुओं की संख्या 20 करोड़ 45 लाख पहुंच गई। इसके बाद लगातार गिरावट दर्ज की गई। 1997 में 19 करोड़ 88 लाख, 2003 में 18 करोड़ 51 लाख 80 हजार तथा 2008 में करीब 16 करोड़ पशु बचे रह गए हैं। एक से तीन दिसंबर तक जम्मू में हुई 'नेशनल कांफ्रेंस ऑन ग्लोरी ऑफ गौमाता' की सेवोनियर में डीएएचडी के आंकड़ों के मुताबिक उत्तार प्रदेश में 2003 तक 1 करोड़ 85 लाख 51 हजार पशु रह गए थे। सूत्रों के मुताबिक 1951 में 3 लोगों के बीच एक पशु था, जबकि 2006 में 7 लोगों के बीच एक पशु रह गया। पशुओं की लगातार गिर रही संख्या के पीछे एक बड़ा कारण है बांग्लादेश को रोजाना 50 हजार पशुओं की तस्करी। दूसरा है, हर साल बढ़ रहे कत्लखाने। इन आंकड़ों के बीच सरकार 1951 में प्रति व्यक्ति को प्रतिदिन दूध की उपलब्धता 132 ग्राम दर्शाती है। यह उपलब्धता बजाए गिरने के 2005-06 में 240 ग्राम प्रति व्यक्ति कैसे हो गई?

कत्लखानों के लिए 500 करोड़

-केंद्र सरकार की 11वीं पंचवर्षीय योजना में यांत्रिक कत्लखानों के लिए 500 करोड़ रुपये अवमुक्त हुए है। हर प्रदेश में खुलने वाले कत्लखानों को इसमें से 25 करोड़ मिलेंगे। प्रदेश सरकार को भी इसमें 25 करोड़ मिलाने होंगे। यानि एक कत्लखाना 50 करोड़ में खुलेगा। इतनी रकम बहाने से कोई लाभ मिलने की बजाए लोगों को नुकसान ही होने वाला है।

आगरा में रोज कटेंगे एक हजार

प्रदेश में खुलने वाले तीन यांत्रिक कत्लखानों में से एक आगरा में होगा। सूत्रों के मुताबिक नगर निगम ने दिल्ली की 'ब्लूक्रास' कंपनी को इसका कांट्रेक्ट दिया है। अब ब्लूक्रास उप्र सरकार से यहां रोज एक हजार बकरियां काटने की अनुमति लेने की कोशिश में है। इतनी बकरियां जनपद में होंगी नहीं। जाहिर है कि टारगेट पूरा करने के लिए इसमें पशुओं की बलि दी जाएगी। गाय-भैंस कटेंगी तो दूध कहां से आएगा?

अवैध रूप से होता है कटान

-जानकारों की मानें तो कत्लखानों में अपंग या मरणासन्न पशुओं का कटान पशु चिकित्सा अधिकारी की अनुमति से हो सकता है। लेकिन ऐसा होता नहीं है। चौंकाने वाली बात है कि पशु काटने वाले धमकाकर या फिर प्रति पशु 500 रुपये देकर यह प्रमाण पत्र प्राप्त कर लेते हैं। कई जगहों पर तो अवैध कत्लगाह चल रहे है। पिछले दिनों शहर का माहौल बिगाड़ने की पीछे ऐसा ही एक कत्लगाह था।

'बंद होने चाहिए स्लॉटर हाउस'

-आगरा के दीन दयाल ग्राम्य विकास संस्थान के प्रवक्ता डा. रजनीश त्यागी के अनुसार पशु को स्वाभाविक मृत्यु होने पर काटा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बात सिर्फ दूध की नहीं, मानव जीवन की है। मनुष्य एक बकरी की मदद से भी जीवित रह सकता है। पर्याप्त गोबर नहीं, इसीलिए यूरिया का अंधाधुंध प्रयोग हो रहा है। ये किसानों को भारी पड़ती है। नतीजतन खाद्य पदार्थो की कीमतें ऊपर जाती है। उन्होंने कहा कि यदि यह सब ऐसे ही चलता रहा तो खोया, पनीर, लस्सी, आइसक्रीम, चाय, कॉफी, स्वादिष्ट मिठाइयां बीते दौर की बात हो जाएंगी और इन सब चीजों के बिना जिंदगी कैसी बदरंग हो जाएंगी यह सोचने वाली बात है।




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