देरी से बढ़ा आरक्षण लागू कराने का खर्च

 
May 15, 08:30 pm

नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। देश में बढ़ती महंगाई का असर केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों पर भी पड़ा है। यही वजह है कि उच्च शिक्षा में पिछड़ों को आरक्षण के लिए संसाधन बढ़ाने के मद्देनजर इन संस्थानों ने केंद्र से और अधिक धन की गुहार लगाई है। इस बीच, सभी संस्थानों ने आरक्षण की तैयारी शुरू कर दी है और सिर्फ गैर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में ही पिछड़े वर्ग के 33 हजार छात्रों को इस साल आरक्षण के जरिये दाखिला मिलने की उम्मीद है।

सूत्रों के मुताबिक लगभग सभी केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों ने आरक्षण के तहत सीटें बढ़ाने में बिल्डिंग व अन्य संसाधनों में लागत बढ़ने का सवाल उठाया है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी और आईआईएम जैसे सभी संस्थानों का कहना है कि पहले की तैयारियों के तहत 2007 से आरक्षण लागू होना था, जबकि अब इसे 2008 से अगले तीन वर्षो में अमल में लाना है। बीते एक साल में महंगाई बढ़ी है, लिहाजा संसाधन बढ़ाने में पहले की तुलना में और अधिक धन की जरूरत होगी। बताते हैं कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी उनके तर्क से सहमति जताई है। आरक्षण के लिए 11वीं योजना में 10,300 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। लागत बढ़ने के मद्देनजर ही उसमें से चालू वित्ताीय वर्ष के लिए और अधिक धन खर्च की बाबत संशोधित प्रस्ताव कैबिनेट को भेजा जा चुका है।

सूत्र बताते हैं कि इस बीच भारतीय प्रबंध संस्थानों ने अपने शिक्षकों को और आकर्षक वेतन और सुविधाओं की न सिर्फ मांग की है, बल्कि वे उसे तय करने का भी अधिकार चाहते हैं। बुधवार को यहां आरक्षण मसले पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ बैठक में भी उन्होंने इस बात को तो उठाया, लेकिन दूसरे संस्थानों ने अपनी अहमियत का हवाला देकर उनके तर्कों को खारिज करा दिया। मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक संस्थानों ने आरक्षण लागू करने की अपनी तैयारियों का जो ब्यौरा सरकार को दिया है-उसके तहत सिर्फ गैर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में ही इस साल 33 हजार पिछड़ों को कोटे के तहत दाखिले का मौका मिलेगा।




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