
नई दिल्ली [जयप्रकाश रंजन]। फटे कपड़े, उलझे बाल और बातचीत के ठेठ देहाती लहजे पर मत जाइए! ईमानदारी में वह देश के कई बड़े औद्योगिक घरानों से बहुत आगे हैं। हम बात कर रहे हैं देश के 90 लाख रिक्शा चालकों की। बैंकों से लिए गए कर्ज को वापस करने में इनका रिकार्ड कई उद्योगों की तुलना में काफी बेहतर है।
दरअसल, पिछले दिनों पंजाब नेशनल बैंक [पीएनबी] ने समाज के गरीब तबके को बैंकिंग सेवा से जोड़ने के लिए रिक्शा वालों को कर्ज देने का विशेष अभियान शुरू किया। अभियान उत्तार प्रदेश के वाराणसी में शुरू किया गया और इसका उद्देश्य था रिक्शा वालों को अपने रिक्शे का मालिक बनाना।
बैंक के अधिशासी निदेशक जेएम गर्ग के मुताबिक हमने अध्ययन किया तो पता चला कि देश के 88.5 लाख रिक्शा चालकों में 95 फीसदी के पास अपना रिक्शा नहीं है। इनमें से अधिकांश दूर-दराज के गांवों से रोजगार की तलाश में शहर आकर रिक्शा खींचते हैं। यही नहीं उन्हें रोजाना 60-70 रुपये का किराया भी देना होता है। इसके बाद ये मुश्किल से 50-75 रुपये की बचत कर पाते हैं।
पीएनबी ने एक गैर-सरकारी संगठन [एनजीओ] के सहयोग से काशी के रिक्शा वालों को महज 11 फीसदी के ब्याज पर कर्ज देना शुरू किया है। कर्ज की राशि 6 से 8000 रुपये होती है। इस हिसाब से रिक्शा वालों को अपनी रोज की कमाई में से केवल 10 से 20 रुपये के बीच ही बैंक की किस्त के लिए निकालनी पड़ती है। यानी आमदनी से उनकी बचत सीधे दोगुनी हो जाती है। गर्ग ने बताया कि कुछ रिक्शावालों ने तो पहले महीने ही एक हजार रुपये वापस कर दिए। इस हिसाब से वे कुछ ही महीनों में पूरा कर्ज चुका सकते हैं और दूसरा रिक्शा खरीद सकते हैं। पीएनबी वाराणसी के बाद इलाहाबाद के रिक्शा चालकों के लिए भी यह स्कीम शुरू कर चुका है। इसके बाद पूरे उत्तार प्रदेश और फिर दिल्ली, बिहार, पंजाब, हरियाणा सहित देश के अन्य हिस्सों में यह स्कीम लागू की जाएगी। इस स्कीम की सफलता से उत्साहित पीएनबी समाज के अन्य गरीब तबकों तक बैंकिंग सुविधा पहुंचाने का अभियान तेजी से शुरू करने वाला है।