सिएटल से लौट कर [जरनैल सिंह]। हिंद महासागर में चीन की परमाणु पनडुब्बियों की थाह लेने वाले लंबी दूरी के 'पी-8 आई' टोही विमान जल्द भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल हो सकते हैं। इसे लेकर अमेरिका में भी हैरानी है। जो 'पी-8 ए' टोही विमान 2009 के अंत तक तैयार होगा उसी को भारतीय नौसेना की जरूरतों के मुताबिक थोड़ा बहुत फेरबदल कर 'पी-8 आई' के तौर पर भारत को देने की तैयारी है। इससे पहले अमेरिका ने कभी भी नई रक्षा प्रौद्योगिकी किसी देश को इतनी जल्दी नहीं दी।
इस विमान के जोड़ का दुनिया में कोई और लंबी दूरी का टोही विमान है ही नहीं। इसीलिए भारतीय नौसेना नियमित रक्षा खरीद नियम कायदों से हट कर इसकी सीधी खरीद की इच्छुक है। पिछले साल जून में नौसेना के तीन अधिकारी यहां आकर इस विमान की विशेषताओं का परीक्षण कर चुके हैं। पी-8 आई कार्यक्रम से जुड़े रिचर्ड बक के मुताबिक 1200 नाटिकल मील के घेरे और 4800 नाटिकल मील की दूरी तक समुद्र के ऊपर और अंदर नजर रखने वाला यह विमान अगले 50 साल तक नौसेना की सेवा में रह सकता है। भारतीय नौसेना जल्द ही इस संबंध में प्रस्ताव जारी करने जा रही है। सौदा होने पर बोईग को चार साल में पहला और आठ साल में आठ विमान देने होंगे।
इस विमान की खासियत यह है कि प्लेटफार्म नागरिक विमान 737 का है जिसे टोही विमान के तौर पर ढाला गया है। इसीलिए यह जेट स्पीड से उड़ सकता है। पी-3 सी ओरायन व रूसी आईएल-38 इस मामले में काफी पीछे हैं। भारत ने अपने आईएल-38 रूस से उन्नत भी करवाए हैं पर नौसेना पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। पी-8 आई को दुनिया के अधुनातन हथियार मिशन सिस्टम्स से लैस किया जा सकता है। बोईग मान रही है कि यह सौदा होने के बाद भारतीय नौसेना और विमानों के लिए भी आर्डर देगी।
वैसे इस सौदे को रूस के लिए झटका माना जाएगा। पहले सेना से संबंधित सभी विमान रूस से आते थे। पहली बार छह सैन्य परिवहन विमान 130 जे हरक्युलिस अमेरिका से खरीदने का सौदा हुआ। अब नौसेना के लिए टोही विमानों का सौदा लगभग अमेरिका की झोली में है और अगर आगे चल कर 126 लड़ाकू विमानों का सौदा भी उसे मिला तो फिर सैन्य विमानों के मामले में अमेरिका का दबदबा हो जाएगा।