नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। भीषण सूखे से त्रस्त बुंदेलखंड में जब तक केंद्रीय राहत पहुंचेगी तब तक वहां बहुत कुछ सूख चुका होगा। इस बदहाल क्षेत्र को मानसून के पहले केंद्रीय राहत की उम्मीद नहीं है। केंद्रीय दल दिल्ली लौट कर अपनी सिफारिशें पेश कर चुका है। लेकिन जून के आखिरी सप्ताह में जब मानसून की दस्तक हो रही होगी, लगभग उसी समय केंद्रीय राहत की घोषणा होने की उम्मीद है।
दूरगामी उपायों के लिए तैयार होने वाले पैकेज में लंबित सिंचाई और पेयजल परियोजनाएं पूरा करने पर ज्यादा जोर देने की संभावना है। इसके अलावा बुंदेलखंड की बुनियादी सुविधाओं को मजबूत बनाने पर भी जोर दिया सकता है। लेकिन इसके लिए जितनी वित्तीय मदद की जरूर होगी, वह मिलेगी या नहीं, इसमें भी संदेह है।
पिछले तीन साल से सूखे की त्रासदी झेल रहा बुंदेलखंड केंद्र व राज्यों की राजनीति का शिकार बन गया है। केंद्र से मिलने वाली तात्कालिक राहत में जबरदस्त भेदभाव किया गया। वजह चाहे जो रही हो, लेकिन तात्कालिक राहत मध्य प्रदेश वाले बुंदेलखंड को तो मिली, लेकिन उत्तर प्रदेश को धेला भर भी नसीब नहीं हुआ।
दूरगामी उपायों के तहत अब एक बड़े राहत पैकेज की घोषणा होनी है, जिसकी तैयारियां चल रही हैं। केंद्रीय दल की सिफारिशों पर विचार-विमर्श हो चुका है। दोनों राज्यों की भी राय ली जा चुकी है। कृषि मंत्रालय कैबिनेट नोट तैयार कर रहा है, जिस पर जून के तीसरे सप्ताह से पहले मंजूरी की मुहर लगने की उम्मीद नहीं है। इस देरी के कई कारण बताए जाते हैं।
दरअसल, उत्तर प्रदेश में जहां बहुजन समाज पार्टी की सरकार है, वहीं मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का शासन है। राजनीतिक मतभेदों के चलते आए दिन आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। इसका खामियाजा बुंदेलखंड के लोगों को उठाना पड़ रहा है।