नई दिल्ली, [संदीप देव]। स्मिता की स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी होने पर उसके माता-पिता ने उसकी शादी करनी चाही, लेकिन स्मिता के जीवन में पहला स्थान कैरियर का था। इस वजह से शादी की बात को ही उसने दरकिनार कर दिया। हालांकि नौकरी के कई वर्ष बाद मां-बाप की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा, लेकिन तब तक उसकी उम्र 28 साल से ऊपर हो चुकी थी। शादी के बाद भी उसके लिए करियर ही महत्वपूर्ण था, जिसकी वजह से उसका पहला बच्चा शादी के चार साल बाद यानि 32 की उम्र में पैदा हुआ। उसकी तेज रफ्तार जिंदगी यहीं नहीं रुकी। उसने मातृत्व सुख से अधिक अपनी नौकरी को तवज्जो दिया। इसका नतीजा यह निकला कि बच्चे के जन्म के दो महीने बाद ही उसने बच्चे का स्तनपान छुड़ा दिया और उसकी देखभाल के लिए घर में आया रख ली। आज स्मिता स्तन कैंसर की शिकार है।
डाक्टरों ने उसे सलाह दी है कि चूंकि कैंसर तीसरे चरण में प्रवेश कर चुका है, इसलिए सर्जरी कर उसके एक स्तन को हटाना पड़ेगा। विशेषज्ञों की मानें तो यह स्मिता द्वारा पहले शादी, फिर बच्चे का जन्म टालने और बाद में बच्चे को स्तनपान न कराने का 'पश्चिमी दृष्टिकोण' ही है जिसकी वजह से वह स्तन कैंसर की शिकार हुई। इसमें पश्चिमी खान-पान यानि डिब्बाबंद व फास्ट फूड खाने ने तड़का लगाकर इसके विकास में और अधिक मदद की। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत के बड़े शहरों की महिलाओं में स्तन कैंसर का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। हर 6.5 मिनट में देश के अस्पतालों में एक स्तन कैंसर का मामला दर्ज हो रहा है। आंकड़ों के मुताबिक पूरे विश्व में प्रति वर्ष चार लाख महिलाएं स्तन कैंसर की वजह से मौत के मुंह में समा रही हैं। भारत में प्रतिवर्ष 80 हजार स्तन कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं।
लंबे समय तक न करें गर्भनिरोधक गोलियों
का प्रयोग
राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर के वरिष्ठ सर्जन डा. हरित चतुर्वेदी ने बताया कि महानगरीय जीवनशैली की वजह से 35 में से एक महिला स्तन कैंसर की शिकार हो रही हैं। पहले बच्चे के जन्म में देरी, व्यस्तता की वजह से बच्चे न होने देने के लिए लंबे समय तक गर्भनिरोधक गोलियों का उपयोग, स्तनपान कराने में कमी, लड़कियों में माहवारी का समय से पूर्व शुरू होना और महिलाओं में देर से मीनोपॉज-स्तन कैंसर के लिए सहायक कारक हैं। सर गंगाराम अस्पताल के कैंसर रोग विशेषज्ञ डा. श्याम अग्रवाल बताते हैं कि आज शहरी व कामकाजी महिलाओं की शादी की औसत उम्र 27 से 30 वर्ष के बीच होती है, जबकि 25 वर्ष की उम्र तक पहला बच्चा हो जाना आवश्यक है। बच्चा पैदा हो भी गया तो आधुनिक माताएं एक से दो माह बाद बच्चों का स्तनपान छुड़ा देती हैं, जबकि मेडिकल साइंस के हिसाब से कम से कम छह माह से एक साल तक बच्चों को स्तनपान कराना चाहिए। इससे स्तन कैंसर की संभावना काफी कम हो जाती है।
कैंसर: विवाहित-अविवाहित फैक्टर
दुनिया भर में कैंसर की वजह से हुई मौतों का मृत्यु प्रमाण पत्र बहुत कुछ कह जाता है। कैंसर की वजह से 40 या उससे अधिक उम्र की विवाहित महिलाओं की अपेक्षा अविवाहित महिलाओं की मौत अधिक हुई है। आंकड़े दर्शाते हैं कि कैंसर की वजह से मरने वाली अविवाहित महिलाओं में अधिकांश स्तन कैंसर की वजह से मौत का शिकार हुई हैं, जबकि विवाहित महिलाओं में गर्भाशय का कैंसर मौत की बड़ी वजह है। अनेक पुरुषो से संबंध बनाने वाली महिलाओं में गर्भाशय के मुख का कैंसर अधिक पाया गया है।
पश्चिमी खान-पान का असर
राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट के चिकित्सा अधीक्षक डा. सुनील खेत्रपाल बताते हैं कि जैसे-जैसे महिलाएं आधुनिक हो रही हैं उनके कार्य में स्थूलता बढ़ती जा रही है और शारीरिक श्रम कम होता जा रहा है। उस पर से पिज्जा, बर्गर, हॉट डॉग, सैंडविच जैसे फास्ट फूड उनके खान-पान में शामिल होते जा रहे हैं। इसकी वजह से मोटापा, मधुमेह और स्तन कैंसर जैसी बीमारियां जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां बन गई हैं। राजीव गांधी इंस्टीट्यूट में प्रतिवर्ष कैंसर के दस हजार नए मरीज आते हैं, जिसमें से 16 फीसदी मामले स्तन कैंसर के होते हैं और यह यहां आने वाले मरीजों में सबसे अधिक हैं।
स्वयं करें स्तन कैंसर की जांच
एम्स के सर्जरी विभाग के अध्यक्ष प्रो. एमसी मिश्रा बताते हैं कि महिलाओं को अपने स्तनों की जांच स्वयं करनी चाहिए। उसमें गांठ बनने, आकार में बदलाव होने, निपल से रिसाव होने, त्वचा के सिकुड़ने, गढ्डा पड़ने और बगल या हंसली के चारों ओर सूजन होने की स्थिति में तत्काल डाक्टर से संपर्क करना चाहिए। स्तन कैंसर जितनी जल्दी पकड़ में आ जाए उतना ही अच्छा है। क्लीनिकल जांच अर्थात मेमोग्राफी से इसका पता चल जाता है। 40 वर्ष की उम्र के बाद वर्ष में कम से कम दो बार मेमोग्राफी कराने की सलाह दी जाती है। ऐसी महिलाओं को तो मेमोग्राफी जरूर करानी चाहिए, जिनके परिवार में स्तन कैंसर का इतिहास रहा हो। जिस महिला की मां या बहन को यह बीमारी रही है, उनमें स्तन कैंसर का जोखिम दोगुना हो जाता है।
स्तन कैंसर का इलाज
एम्स सर्जरी विभाग के ही प्रो. अनुराग श्रीवास्तव के अनुसार बीमारी यदि शीघ्र पकड़ में आ जाए तो अधिकांश महिलाएं इलाज से ठीक हो जाती हैं। कैंसर के अधिक बढ़ जाने पर सर्जरी की जाती है। सर्जरी के बाद भी रेडिएशन, हारमोनल थेरेपी, कीमोथेरेपी जैसे उपचार विधि का सहारा लेना पड़ता है। दरअसल हर महिला की स्थिति एवं उसके कैंसर का स्तर अलग-अलग होता है इसलिए इलाज की विधि भी अलग-अलग होती है।
स्तन कैंसर से बचाव के उपाय
-उचित उम्र में शादी
-25 वर्ष की उम्र तक पहले बच्चे का जन्म जरूरी
-बच्चे को जन्म के छह माह या एक साल तक स्तनपान कराना जरूरी
-शारीरिक क्रियाओं को बढ़ाना
-व्यायाम को जीवनशैली में शामिल करना
-पश्चिमी खाने से पूरी तरह से करें परहेज
-40 वर्ष की उम्र के बाद प्रतिवर्ष मेमोग्राफी कराना