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देश के शूरवीरों को भूल चुकी है सरकार

Jul 27, 02:25 am
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जम्मू [ ललित कुमार]। कारगिल युद्ध के दौरान अपनी सरजमीं को दुश्मनों के कब्जे से छुड़ाने के लिए अपने प्राणों की आहूति देने वाले वीर शूरवीरों के परिजनों को गर्व है कि उनके सपूतों ने देश की मिट्टी के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए लेकिन उन्हें सरकार से इस बात की शिकायत है कि सरकार ने उनकी शहादत को इतनी जल्दी भुला दिया।

शहीदों के परिजनों को आज अगर सरकार से कोई शिकायत है तो वो सिर्फ यही है कि देश के लिए अपना बलिदान देने वाले बहादुर जवानों की याद में सरकार साल में एक बार कोई समारोह तक आयोजित नहीं करती। इन परिजनों को दुख है कि सरकार आने वाली पीढि़यों को इन वीरों के बारे में बताने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही। सेना भी इन शहीदों की याद में जो श्रद्धांजलि समारोह मनाती है, उनमें परिजनों को आमंत्रित नहीं किया जाता। इससे बड़ी दुर्भाग्य की बात क्या होगी कि शहीदों की याद में जो स्मारक बनाए गए उनके रख रखाव पर प्रशासन कोई ध्यान नहीं दे रहा।

कारगिल शहीद मेजर अजय सिंह जसरोटिया के सम्मान में सरकार ने गांधी नगर के मेन स्टाप से पुलिस लाइन चौक तक एक मार्ग शहीद अजय सिंह के नाम पर बनाया है लेकिन इस मार्ग को लेकर लगे बोर्ड पर शहीद का नाम तलाशने से भी नहीं मिलता। इस बोर्ड पर कई राजनीतिक पार्टियों के पोस्टरों के अलावा फिल्मों व ट्यूशन सेंटरों के पोस्टर लगे है। कारगिल युद्ध के दौरान मेजर अजय सिंह जसरोटिया ने द्रास सेक्टर में 15 जुलाई 1999 को दुश्मनों के साथ लोहा लेते हुए शहादत दी थी। उस समय उनकी आयु सिर्फ 19 वर्ष थी। जसरोटिया के पिता अर्जुन सिंह जसरोटिया को आज सिर्फ एक ही शिकवा है कि सरकार ने इन वीरों की शहादत को भुला दिया है। आने वाली पीढि़यों को इन वीरों के बताने के लिए सरकार साल में एक बार समारोह तक आयोजित नहीं करती ताकि लोग इन्हें श्रद्धासुमन अर्पित कर सकें।

कारगिल की चोटियों पर फिर से तिरंगा फहराने के लिए 1999 में शहीद हुए देश के जिन 451 जवानों व अधिकारियों को शुक्रवार को याद किया गया उनमें जम्मू-कश्मीर के 69 योद्धा भी शामिल है। राज्य से शहादत पाने वाले सबसे अधिक 23 युवा लेह जिला से है जबकि कारगिल से चार जवान शहीद हुए। जम्मू जिले से भी 15 वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी।

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