राजनीति में नहीं आना चाहते थे राजीव

 
Aug 19, 03:47 pm

नई दिल्ली। अनिच्छा से राजनीति में पांव रखने वाले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के जीवन की यह विडंबना ही थी कि जिस राजनीति को वह भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे उसी आरोप ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया था।

राजीव गांधी इस मायने में कांग्रेस के खुशकिस्मत अध्यक्ष थे कि उन्होंने 1985 में कांग्रेस की स्थापना के सौ साल पूरे होने पर आयोजित पार्टी महाधिवेशन की अध्यक्षता की थी और इसी में उन्होंने भ्रष्टाचार के बारे में अपनी राय रखी थी। बीस अगस्त 1944 को बंबई में पैदा हुए राजीव ने इसी शहर में आयोजित कांग्रेस के इस अधिवेशन में कहा था कि देश को गरीबों की राजनीतिक सेवा की जरूरत है। देश को ऐसी राजनीति की दरकार है जो विचारधारा और कार्यक्रमों पर आधारित हो। यह लाने के लिए हमें निश्चित तौर पर राजनीतिक दलों और निहित स्वार्थो के बीच का गठजोड़ तोड़ना होगा। हम चुनावी कानून बदलेंगे ताकि स्वच्छ चुनाव सुनिश्चित किए जा सकें। हम राजनीतिक दलों को उन्हें मिलने वाले धन के प्रति जवाबदेह बनाएंगे। हम उनके खिलाफ वैचारिक युद्ध चलाएंगे जो जाति और धर्म के नाम पर गरीबों का शोषण करते हैं।

राजीव के इस भाषण के ढाई दशक बीच चुके हैं लेकिन अब भी भ्रष्टाचार की समस्या जस की तस है और बोफोर्स तोप सौदों को लेकर वह स्वयं इसकी चपेट में आ गए थे।

इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी की सबसे बड़ी संतान ने दून स्कूल से शिक्षा हासिल करने के बाद उच्च अध्ययन के लिए भारत छोड़ दिया था। विदेश प्रवास के दौरान ही 1965 में सोनिया माइनो से उनकी मुलाकात हुई जिनसे माइनो परिवार के शुरूआती विरोध के बावजूद उन्होंने 28 फरवरी 1968 को विवाह किया। राजीव राजनीति में कदम रखने के इच्छुक नहीं थे लेकिन अनुज संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में असमय मौत के बाद परिस्थितियों से मजबूर होकर उन्होंने 11 मई 1981 को कांग्रेस [ई] की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की और 15 जून 1981 को उत्तर प्रदेश के अमेठी संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए जहां से मौजूदा समय में उनके पुत्र राहुल गांधी सांसद हैं। इससे पहले इंडियन एयरलाइन्स के पायलट के तौर पर काम कर चुके राजीव को दो फरवरी 1983 को कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया गया। 31 अक्तूबर 1984 को उनपर भारी विपदा आयी लेकिन देश की बागडोर संभालने की जिम्मेदारी भी मिली। उस दिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई और देश का राजनीतिक माहौल डांवाडोल हो गया। ऐसे नाजुक वक्त में राजनीति के नौसिखुए राजीव के कंधे पर प्रधानमंत्री जैसे जिम्मेदार पद का बोझ पड़ गया जिसे उन्होंने आने वाले समय में बखूबी निभाया। उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल और शुरूआत की जिनमें संचार क्रांति कंप्यूटर क्रांति शिक्षा का प्रसार 18 साल के युवाओं को मताधिकार लाइसेंस- परमिट राज की समाप्ति आदि शामिल हैं। राजीव ने कई साहसिक कदम उठाए जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिजोरम समझौता आदि शामिल हैं।

21 वीं सदी के भारत के बारे में राजीव के विचार स्पष्ट थे। उन्होंने कहा था कि भविष्य में होने वाले सभी परिवर्तनों को पहले से नहीं बताया जा सकता। इतिहास पूर्वनियोजित या पूर्वनिर्धारित नहीं होता। घटनाएं इसलिए मोड़ लेती हैं कि व्यक्ति फैसला लेता है। उन्होंने अपनी इस बात को पुष्ट करते हुए कहा था कि एक आइंस्टीन पदार्थ और ऊर्जा के बीच के संबंध को सामने लाता है। एक लेनिन, एक गांधी, एक माओ और हो ची मिन्ह क्रांति का नेतृत्व करता है। एक जवाहरलाल नेहरू अपना ही लोकतांत्रिक जज्बा पूरे देश को दे देता है। असंभव संभव हो जाता है।

इंदिरा की मृत्यु के बाद हुए 1984 के आम चुनावों में राजीव के नेतृत्व में कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत हासिल किया और पार्टी ने 542 लोकसभा सीटों में 411 पर कब्जा किया लेकिन 1989 आते आते बोफोर्स की प्रेत छाया में यह बहुमत हाथ से खिसक गया और वह नवंबर 1989 में विपक्ष के नेता बने। अपने राजनीतिक फैसलों से कट्टरपंथियों को नाराज कर चुके राजीव पर श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक्त हमला किया गया लेकिन वह बाल-बाल बच गए थे पर 1991 में ऐसा नहीं हो सका। तमिलनाडु के श्रीपेंम्बदूर में एक आत्मघाती हमले में वह मारे गये। उनके साथ 17 और लोगों की जान गई।

राजीव की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जिसे सोनिया गांधी ने छह जुलाई 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया।




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