नई दिल्ली [सत्येन्द्र सिंह]। एनएसजी में परमाणु मसौदे को अनुमति मिल गई। इससे भारतीय समाज व अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ होगा। भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को और गति प्रदान करने के लिए ऊर्जा की बढ़ती मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा मिलने वाली परमाणु प्रौद्योगिकी का चिकित्सा, जैव प्रौद्योगिकी, मौसम पूर्वानुमान व अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही पर्यावरण को भी खतरा नहीं होगा।
अगले 30 वर्षो में भारत में ऊर्जा की मांग करीब तीन गुना बढ़ने की संभावना है। ऐसी स्थिति में ऊर्जा के अन्य स्रोतों की तलाश में भारत को परमाणु ऊर्जा के विकास पर ध्यान केंद्रित करना स्वाभाविक था। पर भारत के पास इसके लिए आवश्यक पूंजी व परमाणु ईधन का अभाव था। यही कारण है कि भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम पिछड़ रहा था। वर्ष 2000 तक 10,000 मेगावाट परमाणु बिजली पैदा करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन निर्धारित अवधि के भीतर उसे प्राप्त नहीं किया जा सका। अब 2020 तक 20,000 मेगावाट परमाणु बिजली पैदा करने का लक्ष्य रखा गया है। समस्या यह थी कि परमाणु रिएक्टर यूरेनियम के अभाव में अपनी स्थापित क्षमता के मुताबिक काम नहीं कर पाते थे। अब उम्मीद की जा सकती है कि समझौते के बाद इस लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद मिलेगी।
भारत को रिएक्टर आयात से तभी फायदा होता, जब उसे ईधन आपूर्ति की गारंटी होती। यह याद रखना होगा कि अमेरिकी पहल पर गठित एनएसजी ने 1974 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर प्रतिबंध लगा दिया था, जबकि अमेरिका तारापुर परमाणु संयंत्र को परिष्कृत यूरेनियम की आपूर्ति के लिए बाध्य था। मौजूदा समझौते के बाद भारत परमाणु ईधन का भंडार बना सकता है। फिर वह अमेरिका ही क्यों, अन्य देशों के साथ भी परमाणु समझौता करके अमेरिका पर से अपनी निर्भरता घटा सकता है।
दरअसल, भारत अपेक्षाकृत कम मात्रा में परिष्कृत यूरेनियम का उत्पादन करता है। इसलिए उसे परिष्कृत यूरेनियम से चलने वाले आयातित रिएक्टर के लिए ईधन की गारंटी भी चाहिए। हालत यह है कि दाबित भारी जल पर आधारित रिएक्टरों के लिए प्राकृतिक यूरेनियम का भी अभाव है, जबकि वह उच्च क्वालिटी का भी नहीं है। वह अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से महंगा भी है। इन परिस्थितियों में यह परमाणु करार भारत की ऊर्जा आवश्यकता की दृष्टि से अहम है। अभी भारत के ऊर्जा उपभोग में कोयला और हाइड्रोकार्बन का हिस्सा सबसे ज्यादा है, 50 वर्ष बाद भी यह स्थिति बरकरार रह सकती है। लेकिन तब इस समझौते की बदौलत परमाणु ऊर्जा की संभावित हिस्सेदारी और बढ़ सकती है। विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि यह इनसे प्राय: महंगी भी नहीं है।
टेबल
भारत में परमाणु ऊर्जा का भावी परिदृश्य
2008 2012 2022 2032 2042 2052
3 3.7 6.5 8.8 12.9 16.4
(कुल ऊर्जा उत्पादन में हिस्सा प्रतिशत में)