लोकतंत्रों ने ध्वस्त की नाभिकीय तानाशाही

 
Sep 07, 02:37 am

नई दिल्ली [अंशुमान तिवारी]। परमाणु बिरादरी से भारत का अलगोझा खत्म होना आसान तो कभी नहीं था, लेकिन यह इतना कठिन होगा इसका अंदाज दुनिया के दिग्गजों को भी नहीं था। उफ.. इतनी जिद कि करीब चालीस बड़ों को किनारे कर तीन-चार छोटों ने वियना से वाशिंगटन तक सबको तिगनी का नाच नचा दिया। फिर भी एनएसजी से भारत को मिली छूट कुछ देशों का भूल सुधार, कुछ जिदों की हार और भारतीय क्षमताओं का स्वीकार है। इस जीत ने भारत को जबरदस्त कूटनीतिक ऊर्जा दी है। रही बात परमाणु ऊर्जा की तो उसके लिए बस अब एक पड़ाव और बाकी है।

भारत को एनएसजी से मंजूरी मिलना परमाणु ईधन और तकनीकों के कारोबार में एक खास किस्म के लोकतंत्र का प्रवेश है और यह लोकतंत्र लाने का काम दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों ने मिलकर किया। ये दो लोकतंत्र वहीं हैं, जिनमें एक ने दूसरे को सबक सिखाने के लिए ही एनएसजी नाम की कठोर संस्था बनाई थी।

एनएसजी की पूरी जिद्दोजहद का शायद सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस संस्था ने अपनी कठोरता का सबसे गहरा तजुर्बा अपने शिल्पकार अमेरिका को ही दिया है। और इसी के चलते परमाणु कारोबार के बंद दरवाजों पर भारत की दस्तक अमेरिका की दस्तक में बदल गई।

दरअसल, परमाणु करार के एनएसजी तक पहुंचते-पहुंचते दांव पर लगी प्रतिष्ठाओं के क्रम में भारत नीचे आ गया था। जब शुक्रवार की रात को वियना में खींचतान ज्यादा ही बढ़ी तो भारत लगभग प्रतीक्षा की मुद्रा में आता नजर आया। शनिवार की सुबह न्यूज चैनलों पर प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों के हवाले से जो बयान चिपका था, उसका मतलब यह था कि भारत ने अपना काम कर दिया और अब अमेरिका को अपनी ताकत दिखानी है। इशारा साफ था कि कोई इस गफलत में न रहे कि यह सिर्फ भारत के फायदे का मामला है, बल्कि इसमें अमेरिका सहित बहुतों के हित और प्रतिष्ठा दांव पर हैं।

पर सिर्फ अमेरिका ही क्यों, क्या खुद एनएसजी की साख दांव पर नहीं थी? कार्बनिक और जीवाश्म ईधनों के बढ़ते इस्तेमाल के बाद पर्यावरण को बचाने की जितनी चिंता यूरोप में दिखती है, उतनी कहीं नहीं है। परमाणु ऊर्जा पर विवाद हो सकता है पर पर्यावरण के लिए इसके सुरक्षित होने पर सवाल कम ही उठते हैं। अगर कुछ ऊंच-नीच होती तो यह तोहमत एनएसजी पर ही आती कि उसने परमाणु ऊर्जा में भारत के कदम रोक कर पर्यावरण को बिगाड़ने का रास्ता साफ किया है। आखिर दुनिया की सबसे तेज दौड़ती अर्थव्यवस्था को ऊर्जा तो चाहिए ही। परमाणु ऊर्जा न मिलने पर वह कोयला व गैस ही फूंकेगी और वातावरण को गरम करेगी।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के हिसाब से भी बड़े,छोटों की यह जिद किस सीमा तक बर्दाश्त करते। आखिर उनकी भी तो कुछ साख है, जिन्होंने आईएईए में भारत को हरी झंडी दी थी। इन बड़ों में भी एनएसजी से भारत का खाली हाथ लौटना अमेरिका की साख पर सबसे गहरी खरोंचें डालने वाला था। इसलिए वियना में सब कुछ ठीक-ठाक होने की जितनी ज्यादा उम्मीदें अमेरिका की तरफ से जगाई गई, उतनी तो भारत की तरफ से भी नहीं जगीं।

दरअसल, अमेरिका के लिए यह बात सिर्फ भारत के साथ परमाणु करार तक सीमित नहीं थी। कूटनीति के मैदान में अमेरिका और यूरोप के बीच प्रतिस्पर्धा पुरानी है और एनएसजी में जिस तरह यूरोपीय, खास तौर पर छोटे यूरोपीय देश हावी हो रहे थे, उस स्थिति में भारत को एनएसजी का इनकार अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय प्रभुत्व की चमक को कम कर सकता था। और जब विरोध करने वालों का झंडा चीन ने थाम लिया तो अमेरिकी राष्ट्रपति चीनी प्रीमियर से सीधे बात करने में भी नहीं हिचके।

यह वही चीन है जिसे अमेरिका की एक छोटी सी कृपा से एनएसजी में प्रवेश मिल गया था। 1974 के परमाणु परीक्षण के बाद सिर्फ भारत को सजा देने के लिए अमेरिका ने यह शर्त रखी थी कि जिन देशों ने 1967 के पहले परमाणु विस्फोट किए हैं, वे ही एनएसजी के सदस्य होंगे। चीन ने विस्फोट 1964 में किया था, इसलिए वह इस ताकतवर संस्था का हिस्सा हो गया।

एनएसजी में हमेशा राजनीतिक और भावनात्मक आग्रह, तर्को से ज्यादा बड़े रहे हैं और नजरिये चट्टान की तरह सख्त पाए गए हैं। इनके कारण ही तो यह यह सबसे कठोर बहुपक्षीय मंच है, लेकिन अब एनएसजी को उसकेअपनों ने ही बदलावों को स्वीकार करना और नजरिये बदलना सिखा दिया है। इसलिए एनएसजी में भारत की स्वीकृति कूटनीतिक हलकों में भी दूर तलक जाएगी।




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