
इंदौर। इंदौर के आसाराम गुरुकुल ट्रस्ट की कथित भूमिका वाले बहुचर्चित लीज डीड उल्लंघन मामले में ट्रस्ट ने अचानक यू टर्न ले लिया है। उसके मौजूदा तेवरों में पुराना दम खम गायब दिख रहा है और गेंद अब जिला प्रशासन के पाले में आ गई है।
कभी मामले में प्रशासन से आर पार की लड़ाई को तैयार दिख रहे ट्रस्ट ने अब विनम्रता के साथ कबूल किया है कि उसने लीज की सरकारी जमीन पर श्रद्धालुओं और विद्यार्थियों की सुविधा के मकसद से कुछ कच्चे पक्के निर्माण किए हैं। लेकिन लगे हाथ उसका दावा है कि यह निर्माण लीज डीड की शर्र्तो के उल्लंघन के दायरे में नहीं आते।
आध्यात्मिक गुरु आसाराम बापू और उनके देशभर में फैले आश्रमों पर विवादों की छाया के बीच इस मामले की शुरूआत कोई एक महीना पहले हुई, जब जिला प्रशासन ने आसाराम गुरुकुल ट्रस्ट को लीज शर्र्तो के कथित उल्लंघन पर नोटिस जारी किया। आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि ट्रस्ट को वर्ष 1998 की शुरूआत में इंदौर से सटे लिम्बोदी और बिलावली गांवों में करीब सात हेक्टेयर क्षेत्रफल वाली कीमती सरकारी जमीन महज एक रुपये के वार्षिक भू भाटक पर दी गई थी। सूत्रों के मुताबिक लीज डीड की शर्र्तो में साफ था कि आवंटित जमीन पर पक्का निर्माण नहीं किया जा सकेगा। सूत्रों की मानें तो प्रशासन को शिकायत मिली कि ट्रस्ट ने लीज डीड की शर्र्तो का उल्लंघन करते हुए आवंटित जमीन पर पक्का निर्माण कर लिया है। साथ ही वहां विभिन्न गतिविधियां भी शुरू कर दी गई हैं। लिहाजा फौरन आसाराम गुरुकुल ट्रस्ट को नोटिस जारी करके जवाब तलब किया गया। दूसरी ओर, ट्रस्ट ने अपने वकील के जरिए दिए गए नोटिस के पहले जवाब में कठोर भाषा का इस्तेमाल करते हुए नोटिस की वैधता पर ही सवालिया निशान लगा दिया। साथ ही इसे फौरन रद्द करने की मांग की। उस वक्त ट्रस्ट की दो टूक चेतावनी थी कि अगर नोटिस निरस्त नहीं किया गया तो जिलाधिकारी के खिलाफ विधिसम्मत कार्रवाई के लिए कदम उठाए जाएंगे। नोटिस के जवाब में ट्रस्ट के वकील मनोहर दलाल ने कुछ कानूनी प्रावधानों के हवाले से कहा कि सरकारी जमीन के बारे में जानकारी इकट्ठी करने के लिए आपको जिलाधिकारी को कारण बताओ नोटिस देने का क्षेत्राधिकार ही नहीं है। आपका नोटिस अवैध शून्य और क्षेत्राधिकार से बाहर है। 14 अगस्त को दिए गए जवाब में कहा गया कि ट्रस्ट ने लीज की जमीन का लीज डीड की शर्तों के मुताबिक ही इस्तेमाल किया है। लीज पर मिली सरकारी जमीन के अलावा क्षेत्रीय किसानों से भी 11 एकड़ जमीन खरीदी गई है, ताकि ट्रस्ट के उद्देश्यों के अनुरूप आवश्यक निर्माण कार्य किया सके। लेकिन ट्रस्ट की ओर से जिला प्रशासन को हाल में भेजे गए दूसरे जवाब में साफ तौर पर उसके तेवर नरम पड़ गए हैं। ट्रस्ट ने नोटिस जारी होने के 22 दिन बाद यानी 28 अगस्त को स्वीकार किया कि उसने श्रद्धालुओें और गुरुकुल के विद्यार्थियों की सुविधा के लिए सरकार से लीज पर मिली जमीन पर कुछ कच्चे पक्के निर्माण किए हैं। हालांकि ट्रस्ट का दावा है कि यह निर्माण लीज डीड की शर्र्तो के मुताबिक ही हैं।
बहरहाल, ट्रस्ट ने संभवत: लीज डीड रद्द होने की आशंका के बीच कहा है कि अगर प्रदेश सरकार लीज पर दी गई जमीन वापस ले लेती है तो वह उस पर हुए किसी भी तरह के निर्माण का मुआवजा नहीं लेगा। ट्रस्ट इस आशय की अंडरटेकिंग देने को भी तैयार है। ट्रस्ट ने जिलाधिकारी से विनम्र निवेदन भी किया है कि वह उसके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सहयोग प्रदान कर अनुगृहित करें। जाहिर है कि लीज डीड उल्लंघन मामले में गेंद अब जिला प्रशासन के पाले में दिखाई दे रही है। प्रशासन इस सिलसिले में अगला कदम उठाने से पहले पूरी एहतियात बरतता दिख रहा है, ताकि भविष्य में उसे किसी कानूनी पचड़े का सामना नहीं करना पड़े। जिलाधिकारी राकेश श्रीवास्तव ने कहा कि हमें ट्रस्ट के दोनों जवाब मिल गए हैं। इस संबंध में कानूनी राय ली जा रही है। इसके बाद ही हम मामले में आगे की कार्यवाही करेंगे।