जरा महिला पहलवानों की भी सुनिए

 
Sep 07, 12:06 pm

नई दिल्ली, [विजय कुमार]। महिला और पहलवानी! वह भी भारत में! क्या बात करते हैं। कोमलता जिसका पर्याय हो, वह अखाड़े की धूल छाने, विश्वास नहीं होता। लेकिन, सच तो यही है। यकीन न हो तो बवाना [दिल्ली-हरियाणा बार्डर] में रविवार को महिलाओं की कुश्ती देख आइए।

सुशील कुमार ने बीजिंग में कुश्ती का कांस्य पदक क्या जीता, मल्लों के देश भारत में सबका ध्यान पुन: इस पारंपरिक खेल की तरफ गया। बलराम, भीम, जरासंध, कीचक और गामा, चंदगीराम, दारा सिंह के देश में एक ऐसा भी समय आया, जब पहलवानों का अकाल-सा लगने लगा था। ऐसे में कुश्ती की तकनीक और सुविधाओं में पिछड़े देश में महिला पहलवानों के प्रति सोच बदलने में समय तो लगना ही था। यही बात एशियाई महिला कुश्ती चैंपियन सोनिका कालीरमन को इस शिकायत के लिए मजबूर करती है कि सरकार महिला पहलवानों को सुविधाएं नहीं देती।

ऐसे तो भारत में महिला पहलवानों की कुश्ती का चलन वर्ष 1996 से हो गया था। लेकिन बारह वर्ष बाद भी वे वहीं हैं जहां से चली थीं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की चालीस से पचास महिला पहलवान श्रेष्ठ मानी जाती हैं। उनमें एक नाम है 72 किलो भारवर्ग में लड़ने वाली छह फीट की सोनिका कालीरमन। चंदगी राम की पुत्री सोनिका का कहना है कि वह और नेहा राठी, गीता व बबीता कुश्ती वाले परिवार से आयी हैं। गीता व बबीता पूर्व राष्ट्रीय पहलवान महावीर सिंह की बेटियां हैं, जो भिवानी में रहकर कुश्ती का अभ्यास करती हैं। हालांकि अस्सी प्रतिशत महिला पहलवान साधारण घरों की हैं। सरकार भी पदक जीतने के बाद मदद को तैयार होती है। शुरुआती दौर में कुश्ती फेडरेशन किसी भी अखाडे़ को महिला पहलवानों के नाम पर कुछ नहीं देते। जबकि सच यह है कि अतिरिक्त खुराक पर उन्हें काफी खर्च करना पड़ता है। मास्टर चंदगी राम का दिल्ली में एकमात्र ऐसा अखाड़ा है, जहां महिला पहलवानों को ट्रेनिंग देने के अलावा उनके ठहरने की व्यवस्था भी है। यहां पर बीस लड़कियां कुश्ती के दांव सीखती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर जीत दर्ज करने के बाद जरूर सरकार से एक हजार रुपये प्रतिमाह महिला पहलवान को दिए जाते हैं। महिला पहलवान इससे नाखुश हैं, क्योंकि इस रकम से उनकी खुराक का भी खर्च नहीं निकलता। उन्हें अपना खर्च निकालने के लिए महिला दंगलों में भाग लेना पड़ता है। चंदगीराम के अखाड़े में महिला पहलवान अपना खाने का खर्च खुद उठाती हैं, जबकि रहने, ट्रेनिंग से लेकर बिजली तक का खर्च खुद मास्टरजी अपनी तरफ से देते हैं।

दिल्ली की सुमेल खान [48 किलो] ने जब कुश्ती को अपनाया, तो उनका सुबह पांच बजे उठकर अभ्यास के लिए जाना भी लोगों को अखरता था। हालांकि परिवार ने उन्हें कभी नहीं रोका। उन्हीं की बदौलत आज वह अंतरराष्ट्रीय स्तर की पहलवानों में अपना नाम जोड़ सकी हैं। उनका कहना है कि जब उन्होंने कनाडा में वर्ष 2003 के राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीता और फिर भारत में एशियन चैंपियनशिप में कांस्य पदक पाया, तो माहौल ही बदल गया। लेकिन सरकार की तरफ से फिर भी मदद नहीं मिली। वह भी सोनिका की तरह दिल्ली महानगर टेलीफोन निगम में नौकरी करती हैं और आज भी सुबह पांच बजे कुश्ती का अभ्यास करने घर से निकल पड़ती हैं।




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