
इटावा [उप्र], [डा. कुश चतुर्वेदी]। दक्षिण भारत के मंदिरों में दलितों का प्रवेश आज के दौर में भी बड़ा मुद्दा है। दक्षिण के इन सद्भाव विरोधी पुरोहित समाज को एक बार उत्तार प्रदेश के इटावा जरूर जाना चाहिए, ताकि उन्हें पता चले कि कैसे करीब दो सौ साल से एक बड़े मंदिर के पुजारी दलित होते आए हैं।
छुआछूत के अभिशाप से त्रस्त हिंदू समाज में सामाजिक समरसता की लौ जलाता है लखना का कालिका देवी मंदिर, जहां का पुजारी कोई ब्राह्मण या सवर्ण जाति का नहीं, बल्कि एक दलित है। मंदिर के बाहर सैयद बाबा की मजार है। देवी दर्शन के बाद इस मजार पर धूपबत्ताी जरूर लगाई जाती है। लखना कस्बा इटावा-औरैया राजमार्ग पर बकेवर से तीन किलोमीटर दूर दक्षिण में बसा है। नजदीक के गांव दलीपनगर के जमींदार खुमान सिंह के पुत्र राव जसवंत सिंह ने मंदिर की स्थापना कराई थी। वह कंधेशी ग्राम में एक देवी मंदिर पर रोज पूजा करने जाते थे। लखना के वयोवृद्ध संस्कृत विद्वान पं. कृष्णेश त्रिपाठी का कहना है कि यहांमठ की स्थापना राव जसवंत सिंह ने सन् 1820 में कराई। उन्होंने एक साथ दो मंदिरों का निर्माण करवाया, जिनमें एक राधाकृष्ण का मंदिर है, दूसरा कालिका देवी का। राधाकृष्ण मंदिर की पूजा का जिम्मा एक चतुर्वेदी पुजारी को सौंपा गया।
तब तक राव जसवंत सिंह का ओहदा जमींदार से राजा का हो चुका था। दूरदर्शी राव ने क्रांतिकारी पहल करके देवी मंदिर की पूजा का दायित्व दलित पुजारी को सौंपा और मंदिर के बाहर बनी सैयद बाबा की मजार का दायित्व मुस्लिम सेवाभावी लोगों को। इन दोनों को जोड़कर उन्होंने जो परंपरा शुरू की थी, वह आज तक कायम है। मंदिर में जब लोग बच्चों के मुंडन अथवा नयी बहू को दर्शन कराने आते है, तो बधाई गाने की भी परंपरा है। बधाई भी चकवा [अनुसूचित जाति] गाते है। यह काम भी वंशानुगत है।
मान्यता है कि चकवा की बधाई सबके लिए मंगलकारी है। आज मंदिर के पुजारी हैं दलित जाति के अखिलेश और अशोक। इससे पहले इनके पिता छोटे लाल और उनसे पहले उनके पूर्वज पुजारी थे। श्रद्धालुओं को भी इस परंपरा पर नाज है। अखिलेश कुमार पांचवीं पीढ़ी के पुजारी हैं। लखना के लोग मंदिर के साथ सैयद बाबा की मजार को हिंदू-मुस्लिम एकता का सबल प्रतीक मानते है। चकवा जाति का बधावा और दलित पुजारी का होना सामाजिक समरसता का प्रेरणादायी उदाहरण है।
राजघराना भी है मशहूर
-लखना का राजघराना भी प्रसिद्ध है। इस स्टेट के मुकदमे मोतीलाल नेहरू और कैलाशनाथ काटजू जैसे वकील लड़ा करते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू युवावस्था में अपने पिता के साथ मुकदमों के सिलसिले में कई बार इटावा और लखना आए। आज मंदिर के प्रबंधन का दायित्व राजघराने के ही रविशंकर शुक्ल और कृष्णशंकर शुक्ल के पास है।