अंगुठा टेक से निजात पाने में चुनौती बने बच्चे

 
Sep 07, 02:29 pm

नई दिल्ली। निरक्षरता की रेत को मुट्ठी में बांधने की सरकार की कोशिश में छह से सात प्रतिशत बच्चे चुनौती बन गए हैं जिन्हें शिक्षा के दायरे में लाना दुष्कर हो गया है।

केंद्र सरकार का इरादा 2010 तक देश में सभी बच्चों को स्कूलों में पहुंचाने का है, लेकिन 11वीं योजना का जो मसौदा तैयार किया गया है उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अंतिम छह से सात प्रतिशत बच्चों को शिक्षा की परिधि में लाना चुनौती है जिन तक पहुंच कठिन है।

पूरी दुनिया में अशिक्षा को समाप्त करने के संकल्प के साथ अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस 8 सितंबर को मनाया जाता है और वर्ष 2008 का थीम साक्षरता ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है। इस साल साक्षरता और स्वास्थ्य के बीच संबंधों के महत्व को उजागर करना इसका लक्ष्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि आजादी के बाद से भारत ने निरक्षरता से मुक्ति पाने की दिशा में महती उपलब्धि हासिल की है और वर्ष 2001 में जहां छह से 14 साल के करीब 4.4 करोड़ बच्चे स्कूलों का मुंह नहीं देख पा रहे थे, वहीं यह आंकड़ा वर्ष 2006-07 में घटकर मात्र करीब पर आ गया।

यूनेस्को ने दुनिया से निरक्षरता को समाप्त करने के लिए 17 नवंबर 1965 को आठ सितंबर को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस घोषित किया और इसके अगले साल यानी 1966 में यह पहली बार मनाया गया। इसका उद्देश्य व्यक्तियों और समुदायों में साक्षरता के महत्व को रेखांकित करना है। यूनेस्को की पिछले साल जारी एजूकेशन फार आल मानिटरिंग रिपोर्ट के ही आंकड़े बताते हैं कि भारत नाईजेरिया और पाकिस्तान में मिलाकर दुनिया के 27 प्रतिशत बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। जहां तक वयस्क साक्षरता की बात है दक्षिण और पश्चिम एशिया भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में 60 प्रतिशत लोग समझ के साथ लिख पढ़ सकते हैं। इस विश्व संगठन का आकलन है कि दुनिया के 127 देशों में 101 देश ऐसे हैं जो पूर्ण साक्षरता हासिल करने से दूर हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। इनमें से 72 देश तो ऐसे हैं जो 2015 तक अपनी वयस्क निरक्षरता स्तर को आधा भी नहीं कर पाएंगे।

भारत में करीब 70 लाख बच्चे स्कूलों में नहीं जा रहे हैं और यह उन 17 देशों में है जहां प्राथमिक शिक्षा से लड़कियों का पलायन ज्यादा है। भारत ने हालांकि संसाधनों की किल्लत और आधारभूत ढांचे के अभाव के बावजूद साक्षरता के क्षेत्र में तेजी से कदम बढ़ाया है और देश में 1991 में साक्षरता दर जहां 52.21 प्रतिशत थी वहीं इसके अगले दशक में यह बढ़कर 64.84 प्रतिशत पर पहुंच गई। यूनेस्को की रिपोर्ट में उल्लेख पाने वाले सर्वशिक्षा अभियान और दोपहर भोजन योजना ने स्कूलों की तरफ बच्चों को आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिर भी 2007 तक प्राथमिक शिक्षा और 2010 तक उच्च प्राथमिक स्तर पर लैगिंक और सामाजिक अंतर को पाटने के सरकारी प्रयास पूरे होने नजर नहीं आ रहे हैं।

देश में निरक्षरता के कलंक को दूर करने में मीडिया की ओर सक्रिय भूमिका नहीं निभाए जाने का आरोप लगाते हुए एक विशेषज्ञ ने कहा कि शिक्षा पर यूनेस्को की रिपोर्ट आने पर उसके कवर पर भारत के स्कूल में जमीन पर बैठी दो लड़कियों की तस्वीर प्रकाशित होने को मीडिया खबर बनाता है, लेकिन कभी मेज और कुर्सियों से विहीन इन स्कूलों की तरफ जाने की जहमत नहीं उठाता। फिर भी सरकारी सूत्रों का दावा है कि 11वीं योजना में निरक्षरता को दूर करने और सभी बच्चों को स्कूलों में दाखिल करने के लिए पर्याप्त प्रयास किए जाएंगे और हर बस्ती के एक किलोमीटर के दायरे में एक स्कूल स्थापित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस योजना में प्राइमरी स्तर पर हर 40 बच्चों पर एक शिक्षक और उच्च प्राइमरी स्तर पर 30 बच्चों पर एक शिक्षक की व्यवस्था सुनिश्चित करने की योजना है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के 600 जिलों में से 597 जिलों को पहले ही संपूर्ण साक्षरता अभियान के तहत शामिल कर लिया गया है और इस बुराई को दूर करने की महत्वाकांक्षी योजना के साथ सर्व शिक्षा अभियान शुरू किया गया है। छह से 14 साल के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा देने के लिए इसे उनका मूल अधिकार बनाने संबंधी संविधान के 86वें संशोधन के बाद सिर्फ बच्चों को स्कूलों तक पहुंचाना महत्वपूर्ण नहीं रह गया है, बल्कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण और जमाने के मुताबिक शिक्षा देना जरूरी हो गया है।




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