
नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के युगपुरुष कुमुद कुमार गांगुली उर्फ अशोक कुमार को ऐसे अभिनेता के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने उस समय प्रचलित थियेटर शैली को समाप्त कर अभिनय को स्वाभाविकता प्रदान की और छह दशकों तक अपने बेहतरीन काम से सिनेप्रेमियों को रोमांचित किया।
फिल्म जगत में दादामुनि के नाम से लोकप्रिय अशोक कुमार के अभिनय सफर की शुरुआत किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी। 1936 में बांबे टाकीज स्टूडियो की फिल्म जीवन नैया के हीरो अचानक बीमार हो गए और कंपनी को नए कलाकार की तलाश थी। ऐसी स्थिति में स्टूडियो के मालिक हिमांशु राय की नजर आकर्षक व्यक्तित्व के धनी लैबोरेटरी असिस्टेंट अशोक कुमार पर पड़ी और उनसे अभिनय करने की पेशकश की। यहीं से उनके अभिनय का सफर शुरू हो गया।
उनकी अगली फिल्म अछूत कन्या थी। 1937 में प्रदर्शित यह फिल्म अछूत समस्या पर आधारित थी और देविका रानी उनकी नायिका थीं। यह फिल्म कामयाब रही और उसने दादामुनि को बड़े सितारों की श्रेणी में स्थापित कर दिया। उस जमाने के लिहाज से यह महत्वपूर्ण फिल्म थी और इसी के साथ सामाजिक समस्याओं पर आधारित फिल्मों की शुरुआत हुई। देविका रानी के साथ उन्होंने आगे भी कई फिल्में की जिनमें इज्जत, सावित्री, निर्मला आदि शामिल हैं। इसके बाद उनकी जोड़ी लीला चिटनिस के साथ बनी।
बिहार के भागलपुर शहर के आदमपुर मोहल्ले में 13 अक्टूबर 1911 को पैदा हुए दादामुनि सभी भाई-बहनों में बड़े थे। गायक एवं अभिनेता किशोर कुमार एवं अभिनेता अनूप कुमार उनके छोटे भाई थे। कलकत्ता [अब कोलकाता] के प्रेसीडेंसी कालेज में पढ़ाई करने वाले अशोक कुमार ने अभिनय की प्रचलित शैलियों को दरकिनार कर दिया और अपनी स्वाभाविक शैली विकसित की।
वह कभी भी जोखिम लेने में नहीं घबराए और पहली बार हिंदी सिनेमा में एंटी हीरो की भूमिका की। 1943 में प्रदर्शित किस्मत में नायक को नया रूप मिला और दर्शकों ने इसे खूब सराहा। इसकी कामयाबी ने इतिहास रच दिया और इसका शुमार हिंदी की सर्वाधिक सफल फिल्मों में होता है। उसी दशक में उनकी एक और फिल्म महल आई, जिसमें मधुबाला थीं। सस्पेंस प्रधान फिल्म महल को भी बेहद कामयाबी मिली।
बाद के दिनों में जब हिंदी सिनेमा में दिलीप, देव और राज की तिकड़ी की लोकप्रियता चरम पर थी, उस समय भी उनका अभिनय लोगों के सर चढ़कर बोलता रहा और उनकी फिल्में कामयाब होती रहीं। उम्र बढ़ने के साथ ही उन्होंने सहायक और चरित्र अभिनेता का किरदार निभाना शुरू कर दिया, लेकिन उनके अभिनय की ताजगी कायम रही। ऐसी फिल्मों में कानून चलती का नाम गाड़ी, विक्टोरिया नंबर 203, छोटी-सी बात, शौकीन, मिली, खूबसूरत, बहू बेगम, पाकीजा, गुमराह, एक ही रास्ता, बंदिनी, ममता आदि शामिल हैं। उन्होंने विलेन की भी भूमिका की। देव आनंद की ज्वैल थीफ में उन्होंने विलेन की भूमिका की थी। उन्होंने कई फिल्मों में स्वयं गाने भी गाए।
दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित अशोक कुमार बाद में टीवी से भी जुड़े और देश के पहले सोप ओपेरा हम लोग में सूत्रधार की भूमिका की। इसके अलावा उन्होंने आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के जीवन पर आधारित धारावाहिक में भी बेहतरीन भूमिका की। फिल्मों में अभिनय के अलावा वह एक चित्रकार और होम्योपैथी के अच्छे जानकार भी थे। उन्हें फिल्मी सफर में कई पुरस्कारों से नवाजा गया और करीब छह दशक तक बेमिसाल अभिनय से दर्शकों को रोमांचित करने वाले दादामुनी 10 दिसंबर 2001 को इस दुनिया को अलविदा कह गए। वह आज भले ही हमारे बीच नहीं हो लेकिन वह करीब 275 फिल्मों की ऐसी विरासत छोड़ गए हैं जो हमेशा हमेशा के लिए दर्शकों को सोचने, गुदगुदाने और रोमांचित करने के लिए पर्याप्त हैं।