सैन्य ट्राइब्यूनल में हिंदी-अंग्रेजी पर विवाद

 
Oct 12, 03:47 pm

नई दिल्ली। सैन्य बलों के लिए अभी न्यायाधिकरण गठित भी नहीं हुआ है कि इसमें हिंदी और अंग्रेजी की भाषा समेत कई विवाद और अड़चनें पैदा हो गई हैं और रक्षा मंत्री एके एंटनी की यह महत्वाकांक्षी परियोजना अधर में झूल रही है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार न्यायाधिकरण में बहस इस मुद्दे पर है कि सैन्य बलों के कर्मियों को यदि खुद पैरवी का अवसर देना है तो इसके लिए हिंदी में सुनवाई होनी चाहिए ताकि जवान अपने मामले में अपना पक्ष खुद पेश कर सके। लेकिन इसके विरोध में दो तर्क हैं। एक तो यह कि हाई कोर्ट के स्तर के मामले इस न्यायाधिकरण में आएंगे और कानूनी शब्दावली को हिंदी में ढालने और उसी भाषा में जिरह करने में बेहद कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।

सूत्रों के अनुसार दूसरा तर्क यह है कि न्यायाधिकरण की प्रधान पीठ नई दिल्ली में स्थापित होने के अलावा चेन्नई, कोंच्चि, कोलकाता और गुवाहाटी जैसी क्षेत्रीय पीठ में कौन सी भाषा अपनाई जाएगी जहां के जवानों की मातृभाषा हिंदी नहीं है।

न्यायाधिकरण की क्षेत्रीय पीठें लखनऊ, चंडीगढ़, जयपुर और मुंबई में भी होनी है। सैन्य न्यायाधिकरण का गठन 15 अगस्त तक हो जाना था लेकिन लेकिन कई बाधाओं के कारण यह अधर में झूलता जा रहा है। न्यायाधिकरण का अध्यक्ष न्यायमूर्ति एके माथुर को नियुक्त किया जा चुका है लेकिन अभी इसके न्यायिक एवं प्रशासनिक सदस्यों तथा गैर न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति नहीं हुई है।

सूत्रों के अनुसार गैर न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति को लेकर कानून और रक्षा मंत्रालय में खींचतान है। कानून मंत्रालय का कहना है कि इन सदस्यों की नियुक्ति संघ लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया से होनी चाहिए जबकि रक्षा मंत्रालय स्वयं ये नियुक्तियां करना चाहता है। समझा जाता है कि रक्षा मंत्री ने इन सदस्यों के लिए जितने पद नौ पीठों के लिए मांगे थे उनमें से 50 प्रतिशत कटौती वित्त मंत्रालय ने कर दी है।

न्यायाधिकरण के न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति में भी पेंच है। हाई कोर्ट के कुछ न्यायधिशों का कहना है कि उन्हें इसका न्यायिक सदस्य बनने पर हाई कोर्ट के न्यायाधीश के बराबर ही दर्जा और सुविधाएं मिलनी चाहिएं।

क्षेत्रिय पीठों के गठन की प्रक्रिया भी कछुए की चाल से चल रही है। सूत्रों ने कहा कि जयपुर की पीठ के गठन के सिलसिले में न्यायमूर्ति माथुर ने पिछले दिनों जयपुर का दौरा किया जहां उन्हें ऐसी इमारत दिखायी गई जिसकी छत टिन की थी। इसके अलावा यह स्थान छावनी के भीतर था। इमारत की हालत और उसके छावनी के भीतर होने पर न्यायमूर्ति माथुर ने एतराज किया। उनका कहना था कि इस जर्जर इमारत में पीठ कैसे काम करेगी और न्याय के लिए इस प्रतिबंधित इलाके में लोग आसानी से कैसे आएंगे।




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