पोटा रिव्यू कमेटी का आदेश राज्यों पर बाध्यकारी

 
Oct 21, 09:28 pm

नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। सुप्रीमकोर्ट ने मंगलवार को आतंकवाद निरोधक कानून [पोटा] के तहत आरोपों का समाना कर रहे अभियुक्तों को प्रभावित करने वाला एक अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि पोटा समीक्षा समिति की मामला समाप्त करने की सिफारिश राज्य सरकारों के लिए मानना अनिवार्य है।

समीक्षा समिति की सिफारिश के बाद अभियुक्तों के खिलाफ लंबित पोटा के आरोप समाप्त हो जाएंगे। कोर्ट ने यह फैसला गोधरा ट्रेन अग्निकांड के अभियुक्तों के बारे में सुनाया है लेकिन इसका असर देशभर की अदालतों में चल रहे पोटा के मामलों पर पड़ेगा। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार या पीड़ित पक्ष समीक्षा समिति के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दे सकते हैं।

गोधरा ट्रेन अग्निकांड में करीब 134 अभियुक्त हैं जिसमें से करीब 83 अभी भी जेल में हैं। पोटा समीक्षा समिति ने कहा था कि अभियुक्तों के खिलाफ पोटा के तहत आरोप नहीं बनते लेकिन फिर भी उन पर मामले समाप्त नहीं हुए थे। इसके पहले इस मामले में तीन उच्च न्यायालयों के अलग-अलग फैसले थे। सुप्रीमकोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ भी सरकारी वकील को विवेकाधिकार देने के फैसलों को सही ठहरा चुकी थी लेकिन मंगलवार को तीन न्यायाधीशों की पीठ ने साफ कर दिया है कि समीक्षा समिति का आदेश बाध्यकारी है। सरकारी वकील या संबंधित अदालत को उसकी समीक्षा का अधिकार नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन, न्यायमूर्ति आरवी रवींद्रन व न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी की पीठ ने पोटा निरस्तीकरण अधिनियम 2004 की धारा 2 [3] व 5 को संवैधानिक ठहराया है। कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के फैसले के उस अंश को समाप्त कर दिया है जिसमें समीक्षा समिति के आदेश के बाद सरकारी वकील को विवेकाधिकार का इस्तेमाल करने की छूट दी गई थी। पीठ ने कहा है कि कानून में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि पोटा समीक्षा समिति सभी मामलों की समीक्षा करेगी चाहे समीक्षा की अर्जी दी गई हो या नहीं। इसका उद्देश्य था कि जिन मामलों में अभियुक्तों के खिलाफ प्रथमदृष्ट्या पोटा के आरोप नहीं बनते उनके खिलाफ पोटा वापस लिया जा सके। कानून में यहां तक कहा गया है कि यदि समिति को लगता है कि मामला चलाए जाने का आधार नहीं है तो जिन मामलों में अदालत ने संज्ञान भी ले लिया होगा वे भी समीक्षा समिति के आदेश की तिथि से वापस ले लिए समझे जाएंगे। इसके बाद सरकारी वकील को फिर से मामले पर विचार करने का अधिकार नहीं है। संबंधित अदालत को भी समीक्षा समिति का आदेश परखने का अधिकार नहीं है और न ही अदालत के पास इस संबंध में कोई निगरानी का क्षेत्राधिकार प्राप्त है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रिव्यू कमेटी के आदेश को कोई भी पीड़ित पक्ष हाईकोर्ट में चुनौती दे सकता है। हाईकोर्ट उस समीक्षा समिति के फैसले की जांच कर सकता है। अगर हाईकोर्ट समिति का आदेश निरस्त कर देता है तो निचली अदालत जहां पोटा के आरोपों में मामला चल रहा था फिर से उस केस की सुनवाई शुरू कर देगा।




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