
देहरादून [केदार दत्त]। प्राचीन भारत की समृद्धि का बखान करने के लिए प्रसिद्ध मुहावरा है कि यहां दूध की नदियां बहती थीं। लेकिन देवभूमि उत्तराखंड में तो वास्तव में ऐसे वृक्ष हैं, जिनके फल का गूदा मक्खन की तरह डबलरोटी में लगा कर खाया जाता है। अब यह बात अलग है कि आम लोगों को इस फल की जानकारी देने में अभी तक राज्य सरकार विफल रही है।
हालांकि उत्तराखंड में इसे मक्खन वाला पेड़ ही कहते हैं। यह मधुमेह और ब्लड प्रेशर के रोगियों के लिए गुणकारी है। विदेशी इसका लुत्फ उठाते हैं, मगर राज्य में इसकी खूबियों की जानकारी बहुत कम लोगों को है। बिना खास प्रयास किए उद्यान महकमा केवल यह उम्मीद करता है कि कभी ट्रेंड बदलेगा और बटरफू्रट लोकप्रिय होगा। एवोकैडो बटरफू्रट नामक यह पौधे वर्ष 1950 में मैक्सिको से लाए गए थे। ये पौधे सबसे पहले बागेश्वर और जौलीकोट [नैनीताल] में लगाए गए। देहरादून के ज्येष्ठ उद्यान निरीक्षक वीसी मिश्र बताते हैं कि एवोकैडो तत्कालीन उद्यान विशेषज्ञ डा. विक्टर साहनी की पहल पर लाया गया और धीरे-धीरे यह राज्य के अन्य हिस्सों में पहुंचा। अल्मोड़ा में एवोकैडो काटेज रेस्ट हाउस में इसके पौधे थे। इस समय बागेश्वर, वजूला, जौलीकोट, ताकुला [अल्मोड़ा], गरुड़ वैली व उत्तरकाशी में इसके पेड़ हैं।
उद्यान विभाग के उपनिदेशक [कुमाऊं] डा. केआर जोशी बताते हैं कि 'बटरफू्रट एवोकैडो में पर्याप्त प्रोटीन होता है, जबकि कोलेस्ट्राल व शुगर नहीं होता। एवोकैडो के फल का गूदा होता है बिल्कुल मक्खन जैसा..खाने में भी और दिखने में भी। यह तीन से छह हजार फीट की ऊंचाई पर लगता है और इसमें फल पांच-छह साल में आते हैं। सूबे में जहां यह फल मिलता है, वहां आने वाले विदेशी सैलानी और भारतीय जानकार इसे बड़े चाव से खाते हैं। डायबिटीज और रक्त चाप से पीड़ित मरीजों के लिए भी यह बेहद लाभदायक है। लेकिन दुर्भाग्य से कम लोग इसके बारे में जानते हैं। यही इसके व्यावसायिक स्वरूप न ले पाने का प्रमुख कारण है।' उन्हें भरोसा है कि मक्खन जैसे गूदे वाले इस फल का व्यावसायिक उत्पादन शुरू होगा, तो यह उत्तराखंड के दूरस्थ इलाकों के ग्रामीणों की आर्थिक दशा संवारने में सहायक होगा।