
नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। सेना के लिए राशन खरीदने में घोटाला करने के आरोपी एक पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल को शुक्रवार को दिल्ली हाई कोर्ट से राहत मिल गई।
अदालत ने सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल के खिलाफ कोर्ट मार्शल पर रोक लगा दी। अदालत का अंतरिम आदेश सेना द्वारा कोर्ट मार्शल का निर्णय लेने के कुछ ही घंटों बाद आ गया।
भारतीय सेना के इतिहास में पहली बार एक लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अधिकारी का कोर्ट मार्शल होने जा रहा था। राशन घोटाले में लिप्त लेफ्टिनेंट जनरल एस.के. साहनी इसकी जद में आए थे। जनरल आफिसर कमांडिंग इन चीफ ने साहनी को 26 नवंबर को हाजिर होने का फरमान भेज दिया था। लेकिन साहनी इस फैसले के खिलाफ तत्काल दिल्ली हाई कोर्ट चले गए। हाई कोर्ट में न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि साहनी को जालंधर के जेनरल कोर्ट मार्शल [जीसीएम] में हाजिर होने की जरूरत नहीं है। पीठ ने कहा, 'हमने अदालती कार्रवाई पूरी होने तक कोर्ट मार्शल नहीं बुलाने का निर्देश दिया है।'
सन 2005 में दाल घोटाले की आरंभिक जांच में पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल साहनी को प्रथम दृष्टया दोषी पाया गया था। वह उस समय सेना मुख्यालय में महानिदेशक [आपूर्ति एवं परिवहन] थे। अब वह रिटायर हो चुके हैं, पर सैन्य अधिनियम के तहत अगर किसी अधिकारी के खिलाफ रिटायर होने से पहले कोई जांच चल रही है तो उसे कोर्ट मार्शल के लिए बुलाया जा सकता है। कोर्ट आफ इन्क्वायरी ने साहनी के अलावा सेना के छह मौजूदा अधिकारियों को भी प्रथम दृष्टया सैनिकों के लिए घटिया दाल खरीदने का दोषी पाया। यह दाल जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से लड़ रहे जवानों के लिए थी। इन अधिकारियों में एक मेजर जनरल और दो ब्रिगेडियर हैं।
जानकारी के अनुसार कोर्ट मार्शल के लिए लेफ्टिनेंट जनरल जे.एस. लिद्दड़ की अगुवाई में सात सदस्यीय कोर्ट मार्शल पीठ गठित की गई थी। इसमें लेफ्टिनेंट जनरल पी.डी. सामंत के अलावा पांच मेजर जनरल शामिल थे। कोर्ट मार्शल के लिए ब्रिगेडियर नवनीत खन्ना को जज एडवोकेट जनरल नियुक्त किया गया था। बताया जा रहा है कि सेना के पास साहनी के खिलाफ काफी सुबूत हैं।
साहनी पर आरोप है कि उन्होंने न केवल दाल की खरीद में अनियमितता बरती, बल्कि ठेकेदारों को आपूर्ति दूर के डिपो में करने के बजाय नजदीक करने की इजाजत दी, जिससे उनके परिवहन खर्च के लाखों रुपये बच गए।
इससे पहले लेफ्टिनेंट जनरल एस.के. दहिया भी मीट घोटाले में फंस गए थे, लेकिन उनका कोर्ट मार्शल नहीं किया गया था। उन्हें कड़ी चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था। वैसे इन दोनों का मामला एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप से सामने आया बताया जाता है।
कोर्ट मार्शल क्या है
कोर्ट मार्शल सेना की अदालत होती है। यहां सेना के लोगों पर लगे आरोपों की सुनवाई होती है। युद्ध के दौरान दुश्मन खेमे के पकड़े गए लोगों या युद्धापराधियों के मामले की सुनवाई भी कोर्ट मार्शल में की जाती है। आम तौर पर सभी देशों की सेनाओं में कोर्ट मार्शल की व्यवस्था होती है।
कोर्ट मार्शल में मामलों की सुनवाई अधिकारियों के एक पैनल द्वारा की जा सकती है। आरोपी की ओर से बहस करने वाला भी अधिकारी ही होता है। वह मुख्य रूप से सेना का वकील होता है।
भारतीय सेना में चार तरह की कोर्ट मार्शल की व्यवस्था है- जेनरल कोर्ट मार्शल [जीसीएम], डिस्ट्रिक्ट कोर्ट मार्शल [डीसीएम], समरी जेनरल कोर्ट मार्शल [एसजीसीएम] और समरी कोर्ट मार्शल [एससीएम]।
भारतीय सैन्य अधिनियम के तहत सैन्य अदालतें अपने लोगों के ऊपर लगे किसी भी आरोप की सुनवाई कर सकती हैं। इसमें आम नागरिक की हत्या या उसके साथ बलात्कार किए जाने का मामला अपवाद है। इन दो मामलों की सुनवाई पहले नागरिक अदालतों में होती है।