नई दिल्ली। राजनीति में आने के सवाल पर अभिनेता संजय दत्त और उनकी पत्नी मान्यता में कोई रजामंदी नहीं हैं।
राजनीति के मामले में साफगोई से अपनी बात कहने वाले संजय दत्त ने राज ठाकरे के सवाल को सफाई से टाल दिया और इस मुद्दे से दूर ही रहना उचित समझा।
संजय और मान्यता की यह आपसी असहमति यहां एच टी समिट में सामने आई। संजय दत्त से पूछा गया था कि क्या वह अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए राजनीति में आकर देश की सेवा करना चाहेंगे तो उन्होंने कहा कि मैं देश की सेवा तो करना चाहता हूं, लेकिन मैं राजनीति को ही इसका एकमात्र साधन नहीं मानता। लेकिन दर्शक दीर्घा में बैठी उनकी पत्नी मान्यता ने इससे असहमति जताई और हाथ हिला-हिला कर इशारा किया कि संजय को राजनीति में आना चाहिए और पिता की विरासत संभालनी चाहिए।
संजय दत्त ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वह देश की सेवा तो करना चाहते हैं, लेकिन वह सिर्फ राजनीति को ही इसका जरिया नहीं मानते और फिलहाल इससे दूर रहना चाहते हैं। संजय दत्त ने यह भी कहा कि पिता की विरासत अगर उनकी सांसद बहन प्रिया दत्त संभालती रहें तो उन्हें कोई एतराज नहीं है। लेकिन उनकी पत्नी मान्यता की दृढ़ मान्यता है कि संजय को राजनीति में आना चाहिए।
लगे रहो मुन्नाभाई की गांधीगिरी और इस फिल्म के उनके मानस पर पडे़ प्रभाव के बारे में संजय दत्त ने निश्छल भाव से कहा कि मैं तो भीतर से मुन्नाभाई ही हूं। मैं जज्बाती बेवकूफ हूं। मैं जिस परिवार में पला हूं वहां गांधीगिरी ही चलती थी और मैं उसके साथ ही बड़ा हुआ हूं। अलबत्ता इस फिल्म ने गांधी के उन सारे सबक को फिर से मेरे सामने ला दिया जिन्हें मैं भुला चुका था।