नई दिल्ली, [नीलिमा शुक्ला]। जनवरी के महीने में कड़ाके की सर्दी पड़ रही है। पारा छह से घट कर चार डिग्री तक पहुंच चुका है। दिन चढ़ने तक शहर के ज्यादातर लोग आराम से अपने घर में रजाई के अंदर दुबके रहते हैं। पर ठंड की परवाह किए बगैर 12 वर्षीय रामू तड़के ही पॉलिश बैग उठाकर कमाई के लिए निकल पड़ता है। धुंध में ही वह पेड़ों की ओट व फ्लाईओवर के नीचे अपनी दुकान के लिए जगह ढूंढता है। बाद में जगह की साफ-सफाई कर भूखे पेट ही रम जाता है।
ठिठुरते हुए ही वह भगवान से प्रार्थना करता है कि उसकी दुकान पर ज्यादा से ज्यादा लोग आएं। ताकि उसके लिए दो वक्त की रोटी की व्यवस्था हो सके। पंजाबी बाग फ्लाईओवर के समीप पॉलिश करने वाले रामू के सिर पर अपनी दो बहनों को पालने की जिम्मेदारी है। उसके पिता की पहले ही मौत हो चुकी है, जबकि मां छोटे-मोटे काम कर परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए पूरे दिन जुटी रहती है।
यह स्थिति अकेले रामू की नहीं,बल्कि दिल्ली के चौक-चौराहों पर छोटे-मोटे काम करने वाले अनगिनत अभावग्रस्त बच्चों की है, जिनकी मजबूरी ने कम उम्र में ही हर मौसम में उन्हें काम करने को मजबूर कर दिया है। ये बच्चे सड़क, रेड लाइट, चौराहों, किसी ढाबे या चाय की दुकान पर काम कर अपना पेट पाल रहे हैं। हाड़ कंपा देने वाली ठंड उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। वे सुबह के छह बजे से रात के 11 बजे तक काम करने को मजबूर हैं। जहां अन्य घरों के बच्चे सर्दी में गर्म कपड़ों से लिपटे रहते हैं और हीटर वाली कारों में सफर करते हुए स्कूल जाते हैं। वहीं ये गरीब बच्चे नंगे पाव फटे चीथड़ों में अपना व परिजनों का पेट पालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि भारतीय दंड संहिता में 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम करवाना गैरकानूनी व उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। पर इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि बावजूद इसके देश की राजधानी दिल्ली में ही 60 हजार बच्चे बाल श्रमिक के तौर पर काम कर रहे हैं। ये बच्चे अपना पेट पालने के लिए घरों या ढाबे में केवल काम ही नहीं करते, काम करने के साथ साथ अपने मालिक की गालियां भी सुनते हैं।
राजौरी गार्डन स्थित एक ढाबे में काम करने वाले सोनू ने बताया कि वह सुबह सात बजे से लेकर रात 11 बजे तक वहां काम करता है। बावजूद इसके मालिक उसे मात्रा 700 रुपये देता है। भर पेट खाना भी नहीं देता। छोटी-सी गलती पर बुरी तरह पीटता है और भद्दी गालियां भी देता है। उसने बताया कि उसके पास सिर्फ एक फटा गर्म कपड़ा है, जिसे वह पूरे हफ्ते पहने रहता है। तिलक नगर चौराहे पर गुब्बारे बेचने वाला रमेश भी पैसे के अभाव में इस वर्ष कोई नया स्वेटर नहीं ले पाया। फटी और मैली चादर में वह कड़ाके की ठंड के बावजूद अपने काम में मुस्तैदी से लगा है। उसने बताया कि वह पूरे महीने में बमुश्किल 600 रुपये का काम कर पाता है, जो दो जून की रोटी के जुगाड़ में ही खर्च हो जाते हैं।