राजकेश्वर सिंह, नई दिल्ली। दलितों, पिछड़ों और मुस्लिम समुदाय की तरक्की के दावे चाहे जितने हों, लेकिन उनकी लड़कियों की पढ़ाई को लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य कम गंभीर हैं। शायद यही वजह है कि इन समुदायों की लड़कियों को खासतौर से पढ़ाने के लिए आवासीय कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों को शुरू कराने में वे उदासीन हैं। जबकि दूसरे राज्यों ने इस मामले में शत-प्रतिशत सफलता हासिल कर ली है।
सूत्रों के मुताबिक देश की ज्यादातर राज्य सरकारों ने अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों और मुस्लिम समुदाय की लड़कियों के लिए कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों खोलने का लक्ष्य शत-प्रतिशत पूरा कर लिया है। उनके यहां पढ़ाई शुरू हो चुकी है। सिर्फ उत्तर प्रदेश, बिहार और आंध्र प्रदेश ऐसे राज्य हैं, जहां तमाम विद्यालय अब तक पढ़ाई शुरू करने की स्थिति में नहीं है। जबकि चालू वित्तीय वर्ष के खत्म होने में तीन महीने से भी कम समय बचा है। सूत्र बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में 23, बिहार में 38, आंध्र प्रदेश में 79 और पश्चिम बंगाल में पांच विद्यालयों में अब तक पढ़ाई नहीं शुरू हो सकी है।
नतीजों पर गौर करें तो इन समुदायों के बच्चों को केजीबीवी में दाखिला दिलाने के मामले में भी उत्तर प्रदेश व बिहार अपने लक्ष्य से दूर हैं। बताते हैं कि बीते दिसंबर तक बिहार दाखिले का जहां 62 प्रतिशत ही लक्ष्य पूरा कर पाया था, वहीं उत्तर प्रदेश 59 प्रतिशत पर टिका रहा। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है। वहां मुस्लिम समुदाय की आबादी ज्यादा है, फिर भी वहां के केजीबीवी में सिर्फ नौ प्रतिशत मुस्लिम लड़कियां पढ़ रही हैं। जबकि बिहार उत्तर प्रदेश से बेहतर है। वहां के केजीबीवी में इस समुदाय की 28 प्रतिशत तालीम हासिल कर रही हैं। इसी तरह झारखंड में मुस्लिम समुदाय की आठ प्रतिशत लड़कियां ही इन स्कूलों में पढ़ रही हैं। इस मामले में आबादी के लिहाज से छोटा राज्य होने के बावजूद हरियाणा सबसे आगे है और वहां मुस्लिम समुदाय की 41 प्रतिशत लड़कियां इन आवासीय विद्यालयों में पढ़ाई कर रही हैं।
हालांकि उत्तर प्रदेश और बिहार में जिन कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में पढ़ाई हो रही है, उनमें कुल दाखिल लड़कियों में अनुसूचित जाति की ही संख्या ज्यादा है। बताते हैं कि इन राज्यों में अनुसूचित जाति की आबादी ज्यादा है, लिहाजा स्कूलों में उनकी संख्या अधिक है। फिर भी बिहार के इन स्कूलों में जहां लगभग 50 प्रतिशत अनुसूचित जाति की लड़कियां पढ़ाई कर रही हैं, वहीं उत्तर प्रदेश में बमुश्किल 40 प्रतिशत ही इन स्कूलों का फायदा ले पा रही हैं। गौरतलब है कि केजीबीवी के मामले में भी केंद्र व राज्यों के बीच खर्च के बंटवारे में वही फार्मूला है, जो सर्वशिक्षा अभियान के लिए लागू है।