आशुतोष झा, नई दिल्ली। पिछले वर्षो में अपनी धीमी गति और अक्सर बड़े मामलों में बेनतीजा रहने के लिए बदनाम रही देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई को अब महसूस हुआ है कि उसकी कार्यशैली में दोष है। लिहाजा उसे बदलने की कोशिश शुरू हो गई है। नए साल की शुरुआत के साथ ही न सिर्फ एजेंसी के ढांचे में बदलाव लाया गया है, बल्कि जांच की रफ्तार तेज करने के लिए अधिकारों का विकेंद्रीकरण भी किया गया है। ये बदलाव पहली जनवरी से लागू भी कर दिए गए हैं।
सीबीआई की नई पहल निठारी, किडनी कारोबार और आरुषि हत्याकांड जैसे मामलों में कितनी मदद कर पाएगी यह कहना तो मुश्किल है। लेकिन यह तय है कि नए साल की नई कवायद कई मामलों की जांच में तेजी ला सकती है। आईआईटी के एक सलाहकार के सुझाव पर सीबीआई में अधिकारों का विकेंद्रीकरण किया गया है। छोटे-छोटे 16 जोन और 60 ब्रांच बनाए गए हैं। कोशिश यह की गई है कि किसी भी जोन में चार-पांच ब्रांच से ज्यादा न हों। यह भी सुनिश्चित किया गया है कि हर राज्य के मुख्यालय में कम से कम एक ब्रांच या इकाई जरूर हो। जोन का भार जहां आईजी या डीआईजी पर होगा, वहीं ब्रांच में डीआईजी/एसपी या अतिरिक्त एसपी जिम्मेदार होंगे। सबसे बड़ी बात है कि मामलों के पंजीकरण या निस्तारण के लिए जोन तक फाइल भेजने की जरूरत नहीं होगी। ब्रांच में मौजूद एसपी रैंक के अधिकारी मामलों के निपटारण में डीआईजी के अधिकारों का उपयोग कर सकेंगे। यानी अब मामला किसी भी स्थान पर हो, उसकी फाइल अधिकतम उस राज्य के मुख्यालय तक ही जाएगी। आर्थिक मामलों की तहकीकात के इंतजाम को ज्यादा दुरुस्त बनाया गया है।
अब कम से कम मामला दर्ज होने या उसे आगे बढ़ाने में देर नहीं होगी, लेकिन यह जरूरी नहीं कि उसी तेजी से मामले निर्णय तक की स्थिति में पहुंच जाएं। ढांचों में बदलाव के बावजूद कोर्ट ट्रायल उसके अधिकार के बाहर की बात है। सीबीआई के आंकड़ों के अनुसार ही विभिन्न अदालतों में वर्ष 2007 के अंत तक 8730 मामले लंबित थे। गौरतलब है कि आर्थिक मामलों में तो दोषी का सीबीआई के हाथों से बचना मुश्किल रहा है, लेकिन दूसरे अपराधों के मामले अधिकतर अटकते रहे हैं। गौरतलब है कि कोर्ट में सीबीआई सलाहकार या अधिवक्ता की नियुक्ति भी सीबीआई अपनी इच्छा से नहीं कर सकती है। यानी स्वायत्त संस्था के रूप में स्थापित सीबीआई के पास पूरी कमान अभी भी नहीं होगी।