नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। ट्रांसपोर्टरों के खिलाफ एक दिन पहले तक हल्की सख्ती दिखा रही केंद्र सरकार का रुख मंगलवार को और कड़ा हो गया। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री टीआर बालू ने साफ लहजे में कह दिया है कि यदि ट्रंासपोर्टर बाज न आए तो परमिट तो रद होंगे ही, उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी। दूसरी तरफ आल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस [एआईएमटीसी] की समझ में नहीं आ रहा कि अब क्या किया जाए। क्योंकि सरकार के कड़े रुख के बाद शुरू में साथ आई तमाम ट्रांसपोर्ट यूनियनें हड़ताल से कन्नी काटने लगी हैं।
एआईएमटीसी के पदाधिकारियों के चेहरे पर चिंता की रेखाएं साफ दिखाई दे रही थीं। फिर भी इसके अध्यक्ष चरणजीत सिंह लोहरा ने घुड़की दी कि यदि परमिट रद किए गए तो इससे उत्पन्न स्थिति के लिए सरकार खुद जिम्मेदार होगी। उधर, देश भर से मिल रही खबरों के मुताबिक महाराष्ट्र को छोड़कर बाकी राज्यों में ट्रक हड़ताल का खास असर नहीं है। इंडियन फाउंडेशन आफ ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड ट्रेनिंग के सीनियर फेलो एसपी सिंह के मुताबिक दिल्ली से उत्तार प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्ताीसगढ़ तथा राजस्थान की ओर जाने वाले ज्यादातर ट्रक चल रहे हैं।
वैसे भी हड़ताल का असर मुख्यत: राज्यों के बीच होने वाले यातायात पर है। राज्यों के भीतर यातायात सामान्य है। उत्तार भारत में पंजाब और हिमाचल की ओर ट्रकों का संचालन थोड़ा प्रभावित है। मगर एनसीआर पर विशेष असर नहीं है। दिल्ली मेट्रो रेल को होने वाली स्टील और सीमेंट की सप्लाई निर्बाध है। दिल्ली से रोजाना 15 हजार ट्रक गुजरते हैं। वे चल रहे हैं। एनसीआर की 27 ट्रक आपरेटर्स यूनियनें हड़ताल में शामिल नहीं हैं। रोपड़, सोलन, मालनपुर की सीमेंट फैक्ट्रियों से ट्रकों द्वारा माल बाहर जा रहा है। मारुति, हुंडई, यामहा, हीरो होंडा, होंडा मोटर्स की फैक्ट्रियों से कारों का लदान भी बदस्तूर जारी है।
हड़ताल का आह्वान पौने तीन लाख गुड्स बुकिंग एजेंट्स यानी ट्रांसपोर्ट कंपनियों ने किया है। ये व्यापारियों का माल बुक करती हैं और उनके माल को अपने तथा अन्य छोटे-छोटे ट्रक वालों की मदद से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाती हैं। देश में करीब 43 लाख ट्रक हैं। इनमें से बहुत कम ट्रक ही ट्रांसपोर्टरों के अपने हैं। बाकी छोटे ट्रक मालिकों के हैं जो ट्रांसपोर्ट कंपनियों के लिए काम करते हैं। ट्रक वालों की शिकायत है कि ट्रांसपोर्ट कंपनियों का पूरा कारोबार अपारदर्शी है। वे कमाई के मुकाबले सरकार को बहुत कम टैक्स देती हैं और ट्रक वालों का शोषण करती हैं, जबकि सड़क पर सारी परेशानियां ट्रक वालों को झेलनी पड़ती हैं।
इन्हीं पेंच की वजह से ही इस कारोबार को नियमित करना सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है। इसीलिए पिछले साल कैरिज बाइ रोड एक्ट पारित कराया गया था। इस एक्ट के प्रावधान ऐसे हैं कि ट्रांसपोर्टरों के लिए अपने कारोबार को छिपाना और टैक्स चोरी करना मुश्किल हो गया है। इसी से वे परेशान हैं और हड़ताल के जरिए सरकार से रियायतें हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।