गाधीनगर, [शत्रुघ्न शर्मा]। गुजरात के कुछ इलाके में गिरते लिंगानुपात के कारण समाज में शुरू हुई 'आटा-पाटा' की प्रथा के और विस्तार की स्थिति बनती लग रही है। राज्य में पुरुषों और महिलाओं की संख्या का अंतर काफी बढ़ रहा है। सूरत में तो स्थिति बेहद खराब है। ऐसे में आशंका बढ़ गई है कि 'आटा-पाटा' की प्रथा सूरत में भी शुरू हो सकती है।
गुजरात सरकार के वर्ष 2008-2009 के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक सूरत में पिछले दस वर्ष में प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 901 से घट कर 810 रह गई है। राज्य विधानसभा के बजट सत्र में पेश इस सर्वेक्षण में राज्य के सभी 26 जिलों में गत सौ वर्ष में पुरुष व महिलाओं के अनुपात में आए अंतर के आकड़े दिए गए है।
सौ वर्ष में जहा गुजरात में प्रति हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या 954 से घट कर 920 रह गई है। इस दौरान सूरत की स्थिति सबसे अधिक बिगड़ी है। यहा वर्ष 1901 में जहा प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 992 थी, वहीं अब यह 810 है। यानी 182 का अंतर। वलसाड में यह अंतर 72 का है, जबकि कच्छ में 58, अहमदाबाद में 55 और साबरकाठा में 49 का अंतर आया है।
पिछले दस वर्ष के दौरान लिंगानुपात में आई गिरावट पर नजर डाली जाए तो इसमें भी सूरत सबसे आगे है। इस दौरान यह आंकड़ा 91 रहा, जबकि वलसाड में 37, मेहसाणा में 24, गाधीनगर में 22, कच्छ और साबरकाठा में 18-18, राजकोट में 16 तथा पाटण में 12 का अंतर दर्ज किया गया है।
पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या कम होने के कारण गुजरात के कई समाजों में 'आटा-पाटा' की प्रथा प्रचलित हो गई है। उत्तार गुजरात के मेहसाणा और दक्षिण गुजरात के कई आदिवासी बहुल जिलों में आज भी इस प्रथा का खूब चलन है। इसके तहत जिस परिवार में लड़की दी जाती है, उसी से लड़की ली भी जाती है। मेहसाणा में कभी प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 1002 तथा नवसारी में 1041 थी, जो आज घटकर क्रमश: 927 व 955 रह गई है। इसलिए यहां 'आटा-पाटा' की प्रथा शुरू हुई और जोर भी पकड़ गई।