
नोएडा, [मनोज त्यागी]। दोस्त को मिला असहाय दर्द वह सह नहीं पाए। हृदय विदारक घटना ने उन्हें अंदर तक झकझोर कर रख दिया। फिर क्या था भारतीय वायुसेना से सेवानिवृत फ्लाइट इंजीनियर मुकुल चंद्र जोशी ने मन में ठान लिया। रोजाना लोगों को यातायात नियमों के बारे में जागरूक करूंगा।
बात सात वर्ष पहले की है, वायुसेना से रिटायर अधिकारी टीआर कपूर का 18 वर्षीय बेटा उनका स्कूटर लेकर घर से निकला, लेकिन वापस घर नहीं लौटा। रास्ते में उसकी एक वाहन से टक्कर हो गई। 24 घंटे आईसीयू में रहा, लेकिन मौत से पार न पा सका। उसने वही गलती की थी, जो अक्सर वाहन चलाते समय लोग करते हैं। वह बिना हेलमेट स्कूटर चला रहा था। इसी घटना ने टीआर कपूर के घनिष्ट मित्र मुकुल चंद्र जोशी को ट्रैफिक बाबा बना दिया।
उनके तन पर पुलिस की वर्दी नहीं होती है, लेकिन उन्हें देखते ही यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाले ठिठक जाते हैं। जिसके सिर पर हेलमेट नहीं होता है उसके सिर पर हेलमेट आ जाता है, जिसने कार में सीट बेल्ट नहीं लगाई है वह सीट बेल्ट लगा लेता है, रेड लाइट जंप करने वाले नियम तोड़ने से डरते हैं, वाहन चालक जेब्रा क्रासिंग से पीछे खड़े होते हैं।
ट्रैफिक बाबा के नाम से अपनी पहचान बना चुके जोशी के लिए चौराहे पर खड़े होकर लोगों को यातायात नियम बताना उनकी दिनचर्या बन गया है। मकसद सिर्फ इतना है कि किसी का बेटा, भाई व पति सड़क दुर्घटना में असमय काल का ग्रास न बने। जैसे उनके दोस्त का बेटा मामूली सी चूक के चलते भगवान को प्यारा हो गया था।
शुरू-शुरू में लोगों ने उन्हें सनकी और पागल करार दिया, लेकिन उनका जुनून आम जनमानस पर भारी पड़ा। सनकी और पागल करार देने वाले लोग उनकी गांधीगिरी के कायल हो चुके हैं। उन्हें देखते ही ताली बजाकर व हाथ हिलाकर स्वागत करते हैं। लोगों से मिल रहे सहयोग व प्रेम का ही नतीजा है कि 74 साल की आयु में भी वही जज्बा कायम है। जो जवानी में था।
ट्रैफिक बाबा ने यातायात के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए बाल सेना बनाने का भी बीड़ा उठाया है। इच्छा को मूर्तरूप देने के लिए वह पार्क में खेलते बच्चों को इकट्ठा कर यातायात नियमों की जानकारी देते हैं। ट्रैफिक बाबा एक अविस्मरणीय वाक्या बताते हैं। सात माह पहले एक रेस्टोरेंट मालिक बिना सीट बेल्ट लगाए हुए थे। तब मैंने उन्हें सीट बेल्ट जरूर लगाने के लिए कहा था। यह बात उन्होंने गांठ बांध ली। एक दिन उनकी कार का एक्सीडेंट हो गया। उस समय में विदेश में था। उन्होंने सीट बेल्ट बांधी थी, जबकि उनके दोस्त ने बेल्ट नहीं लगाई थी। एक्सीडेंट में उनके दोस्त की मौत हो गई। बाद में वह हमारे घर आए और पूरा वाक्या बताया। जब मै विदेश यात्रा से लौटा, तो मुझे घटना की जानकारी दी गई। इससे मेरा हौसला और बढ़ा व मैंने दुगुने उत्साह से लोगों को जागरूक करना शुरू किया। अब तक वह हजारों लोगों को जागरूक कर चुके हैं। पंपलेट आदि पर होने वाला खर्च वह खुद उठाते हैं।