मोबाइल, इंटरनेट से हिंदी लिपि को खतरा

 
Sep 13, 06:36 pm

नई दिल्ली। हर हाथ में मोबाइल फोन और हर घर तक इंटरनेट की पहुंच बनाने की कंपनियों की कोशिश के बीच हिंदी भाषा के समक्ष नई प्रौद्योगिकी ने उसकी लिपि देवनागरी के लोप का खतरा पैदा कर दिया है। विशेषज्ञ इस बात से चिंतित हैं कि मोबाइल फोन से एसएमएस करने और इंटरनेट से चिट्ठी लिखने में अंग्रेजी भाषा की रोमन लिपि का इस्तेमाल हिंदी लिखने में किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि दिनों दिन बढ़ते मोबाइल फोन और इंटरनेट के इस्तेमाल में सामग्री लिखने के लिए आमतौर पर लोग अंग्रेजी के की बोर्ड का इस्तेमाल कर रहे हैं और ज्यादातर रोमन लिपि में हिंदी लिख रहे हैं, जिसमें शब्दों का च्च्चारण तो हिंदी का होता है लेकिन वह लिखी रोमन की वर्णमाला में जाती है।

इन विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस तरह का प्रयोग स्कूलों में पढ़ने वालेच्बच्चे ज्यादा कर रहे हैं जो भविष्य के नागरिक हैं। उनमें यदि शुरू से ही हिंदी में इनपुट देने की प्रवृत्ति नहीं होगी तो आने वाले समय में देवनागरी लिपि के लुप्त होने का खतरा पैदा हो जाएगा।

हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव भी इस चिंता से सहमत दिखे। उनका कहना है कि इस प्रवृत्ति से हिंदी की लिपि के लोप का खतरा है। देव ने कहा कि लोग हिंदी को सिर्फ बोली के तौर पर ले रहे हैं और उसकी लिपि पर विचार नहीं कर रहे हैं। इस स्थिति से बचने के बारे में उन्होंने कहा कि भारत, भारतीयता और भारतीय भाषाओं को बचाने की पहल देश के भीतर से करनी पड़ेगी।

कुछ अध्ययनों में कहा गया है कि 2013 तक भारत दुनिया में मोबाइल इस्तेमाल करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश होगा। मौजूदा समय में देश में करीब 40 करोड़ लोग मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि इंटरनेट का उपयोग करने वालों की संख्या भी करोड़ों में है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर राधेश्याम दूबे ने भी इस पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे भयभीत होने की बजाय मुकाबला करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इसका समाधान घरों में बच्चों को देवनागरी में लिखने पढ़ने की आदत डालकर ही निकाला जा सकता है। उन्होंने कहा कि मीडिया इस प्रवृत्ति में अहम भूमिका निभा रही है क्योंकि टीवी पर एक बाइक के विज्ञापन में रोमन लिपि में ही लिखा आता है कि अब पीछे क्यों बैठना।

भारतीय जनसंचार संस्थान में प्रोफेसर आनंद प्रधान ने कहा कि हिंदी पर अंग्रेजी के दबदबे की मुख्य वजह आम लोगों के भीतर भाषा के गौरव की भावना का लोप होना है। उन्होंने कहा कि देश में आजादी के आंदोलन और 70 के दशक में समाजवादियों के नेतृत्व में चलाए गए हिंदी आंदोलन का असर खत्म हो गया है जिसका स्थान बाजारवाद और उपभोक्तावाद ने ले लिया है।

प्रधान ने यह भी कहा कि देश में नवधनाढ्य वर्ग अपनेच्बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ा रहा है और गरीब भी समझने लगा है कि अंग्रेजी के बल पर ही आगे बढ़ा जा सकता है अत: चुनौती तो पैदा हो ही गई है।




लेख को दर्जा दें

दर्जा दें

0 out of 5 blips

(29) वोट का औसत

average:4.48276
Saving...
    शीर्षकों को अपने "मेरा याहू " पृष्ट पर शामिल करें
  • राजनीति
    Add to My Yahoo! xml
  • अपराध
    Add to My Yahoo! xml
  • दुर्घटना
    Add to My Yahoo! xml
  • आतंकवाद
    Add to My Yahoo! xml
इस पृष्ठ की सामग्री जागरण प्रकाशन लिमिटेड द्वारा प्रदान की गई है
कॉपीराइट © 2009 याहू वेब सर्विसेज़ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड सर्वाधिकार सुरक्षित