नई दिल्ली। भारत का महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-1 भले ही समय से पहले रुक गया, लेकिन उसने वह कर दिखाया जो अब तक किसी मिशन से मुमकिन नहीं हुआ था। चंद्रयान बर्बाद होने से पहले चांद की सतह पर पानी होने का पुख्ता संकेत दर्ज कर चुका था। यह खोज इतनी अहम है कि इससे पृथ्वी से इतर, दूसरे ग्रहों पर जीवन की खोज को नया आयाम मिल सकता है।
चंद्रयान एक के 'मून मैपर' ने चांद पर पानी पाए जाने के संबंध में अप्रत्याशित खोज की है। इस नई खोज के अनुसार हो सकता है कि चांद की सतह पर अभी भी पानी बनने की प्रक्रिया जारी हो। यह खोज उन पुराने अनुमानों के विपरीत है जिनमें कहा जाता रहा है कि चांद की सतह सूखी है।
नासा के मून मिनरोलॉजी मैपर [एम 3] उपकरण के प्रधान शोधकर्ता कार्ल पीटर्स ने कहा कि चंद्रमा के ऊंचे पर्वतीय इलाके में जल होने के जबरदस्त रासायनिक साक्ष्य मौजूद हैं। चंद्रयान के अनुसंधान अभियान में धरती के इस एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा पर पानी का पता लगाना भी शामिल था। चंद्रयान एक से पिछले महीने की 30 तारीख को समय से पहले ही संपर्क टूट गया था। लेकिन संपर्क टूटने से पहले ही उसने यह खोज कर ली थी।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन [इसरो] के प्रमुख जी माधवन नायर ने बेंगलूर में आज कहा कि इस खोज से एक 'नई दिशा' मिलेगी। उन्होंने कहा कि अभी तक किसी भी चंद्र अभियान में सकारात्मक निष्कर्ष नहीं मिल पाए थे।
इस अध्ययन में अपन प्रमुख योगदान देने वाले इसरो के वैज्ञानिकों जे एन गोस्वामी और मइलस्वामी अन्नादुरई इस खोज से अत्यधिक प्रसन्न हैं।
चंद्रयान एक के परियोजना निदेशक अन्नादुरई ने बेंगलूर में कहा, 'हमाच्े बच्चे ने अपना काम पूरा कर लिया।' पीर्ट्स की यह खोज विज्ञान पत्रिका साइंस के नवीनतम अंक में प्रकाशित हुई है जिसमें उन्होंने कहा है कि एम 3 के परिणामों से पता चलता है कि चांद की सबसे ऊपर की सतह पर थोड़ी मात्रा में पानी मौजूद है। हालांकि, पानी की सही मात्रा के बारे में जानकारी नहीं मिल पाई है लेकिन वैज्ञानिकोंका मानना है कि चांद की सतह की एक टन मिट्टी में लगभग एक लीटर तक पानी मिल सकता है।
पीर्ट्स ने इस खोज में इसरो की भूमिका के लिए उसे श्रेय देते हुए कहा है कि अगर वह [इसरो] नहीं होते हम यह खोज कर पाने में सफल नहीं होते।
इससे पहले नायर ने कहा, 'पानी के सबूत मिलने की पुष्टि हुई है। जहां तक चंद्रयान-1 अभियान की बात है, यह मील का पत्थर साबित हुआ है। अभी तक किसी भी अभियान में चंद्रमा पर जल की मौजूदगी की पुष्टि नहीं हुई थी।'
इस संबंध में आंकड़े देने वाला प्रमुख उपकरण नासा मून मिनेरोलाजी मैपर था जिसे चंद्रयान एक में ग्यारह अन्य उपकरणों के साथ लगाया गया था। इसके अलावा चंद्रयान में हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजर और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का मून इंपेक्ट प्रोब भी लगाया गया था। चंद्रयान एक को पिछले साल 22 अक्टूबर को छोड़ा गया था। लेकिन पृथ्वी पर स्थित उसके नियंत्रण कक्ष से उसका संपर्क टूट जाने के बाद यह अभियान अचानक रोक देना पड़ा था।
अब तक वैज्ञानिक यह कहते आ रहे थे कि चांद के धु्रवों पर मौजूद गहरे गड्ढों की स्थाई काली सतह पर बर्फ हो सकती है लेकिन चांद की शेष सतह सूखी है। इस नए शोध से चांद पर पानी होने अथवा नहीं होने के बारे में पिछले चार दशक से लगाई जा रही अटकलों पर विराम लग गया है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि इस खोज से चांद पर लोगों का ध्यान एक बार फिर केंद्रित हो जाएगा। अंतरिक्षयात्री 40 साल पहले जब चांद पर गए थे उसके बाद से इस बीच चांद में लोगों की रुचि कम हो गई थी।
अपोलो अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा स्मृति के रूप में लाए गए पत्थर के नमूनों का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने पहले दावा किया था कि चंद्रमा पर लगभग 40 साल पहले पानी का अस्तित्व था।
वैज्ञानिकों को अपनी इस खोज पर संदेह भी था क्योंकि जिन बक्सों में चांद की चट्टानों के अंश लाए गए थे, उनमें रिसाव हो गया था। इस कारण ए नमूने वातावरण की वायु के संपर्क में आकर प्रदूषित हो गए थे।
वैज्ञानिकों का मानना था कि नाभिकीय विखंडन के परिणामस्वरूप चंद्रमा की चट्टानों और मिट्टी में मौजूद ऑक्सीजन की प्रोटोंस के रूप में सूर्य द्वारा उत्सर्जित हाइड्रोजन के साथ हुई अंत:क्रिया से पानी बना होगा।
एम 3 उपकरण ने पानी के तत्वों की पहचान के लिए इस बात का विश्लेषण किया कि चंद्रमा की सतह पर सूर्य का प्रकाश किस तरह परावर्तित होता है जिसमें वैज्ञानिकों ने पानी जैसे रासायनिक संबंधों वाले तत्वों को पाया। हालांकि यह उपकरण चंद्र सतह की अत्यंत ऊपरी परतों को ही देख सकता है..शायद सतह के केवल कुछ ही सेंटीमीटर नीचे तक देख सकता है।