गाजीपुर। हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद शरीर को अग्नि को समर्पित कर दिया जाता है लेकिन गाजीपुर जिले के तिरछी व श्रीरामपुर जैसे कुछ गांवों में शवों का दाह संस्कार नहीं किया जाता। पूर्वजों की इस परंपरा का निर्वाह मौजूदा वंशज भी कर रहे है। वैसे जमानिया तहसील के करहियां, सेवराई, अमौरा, देवल आदि गांव के सकरवारवंशीय क्षत्रिय भी पहले शव का जलप्रवाह ही करते थे। लगभग आधे दशक से कुछ लोगों ने इस परंपरा को तोड़ दिया है।
संत, महात्माओं के समाधि लेने की पुरातन व्यवस्था हिंदू धर्म में रही है। इस व्यवस्था को कोई जनसमुदाय अपना ले तो वह चर्चा का विषय बन जाता है। कुछ ऐसा ही तिरछी व श्रीरामपुर गांव को लेकर भी है। सिद्धपीठ हथियाराम मठ के दूसरे महंथ गुलाल साहब का जन्म तिरछी गांव में हुआ था। उन्होंने सिद्धपीठ हथियाराम मठ की गद्दी संवत 1766 से 1816 तक संभाली। गद्दीनशीन होने के बाद उन्होंने क्षेत्र के लोगों से परंपरागत आडंबरयुक्त व्यवस्था से मुक्त होने का आह्वान किया। इसके तहत शवों का जलप्रवाह, मुखागिन् न देने समेत त्रयोदशाह न करना, दसवां के दिन महापात्रों को दान न देने आदि की बंदिशें लगाने पर जोर दिया। महंथ गुलाल साहब के वचन को मानते हुये जिले के जखनिया ब्लाक के तिरछी व श्रीरामपुर गांव के वाशिंदे आज भी इस परंपरा पर कायम हैं। वे शव के जल प्रवाह के एक माह बाद भण्डारा करते है, जिसमें गरीबों व संतों को भोजन कराते हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति जमानिया तहसील के करहियां, सेवराई, अमौरा, देवल आदि गांव के सकरवार वंशीय क्षत्रियों की भी है। वे भी शवों को अग्नि को समर्पित नहीं करते। मुखाग्नि की रस्म के बाद वे शव को जल में प्रवाहित कर देते है। इसके पीछे क्या कारण है, इसकी जानकारी किसी ग्रामीण को नहीं है। इन ग्रामीणों का कहना है कि पुरातन काल से चली आ रही परंपरा को वह आज तक निभा रहे है।