
बलिया। पौराणिक काल से चले आ रहे ददरी मेले में, जहां अध्यात्म की धारा प्रवाहित होती है, वहीं सामाजिक दृष्टि से भी इसकी खास अहमियत है। यहां के लगने वाले 'गदहा मेला' में नेपाल के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश तथा अन्य राज्यों से इस रजक समाज के लोग एकत्रित होते हैं। वे मेले में जहां गधों की खरीदारी करते हैं, वहीं योग्य वर या वधू मिलने पर रिश्ते भी तय कर देते हैं। इन रिश्तों में दहेज का लेन-देन बिल्कुल नहीं होता है। मेले की खासियत है रजक समाज की महापंचायत। यह पंचायत पांच दिनी मेले में हर शाम बैठती है, जिसमें बिरादरी से जुड़े मुद्दों का मौके पर ही निपटारा होता है।
ऐसा नहीं है कि नगर से सटे बंधे के दक्षिणी छोर पर नंदी ग्राम में लगने वाले इस मेले में केवल गधे ही बिकने आते हैं। अन्य पालतू पशुओं का भी बाजार सजता है लेकिन गधों के मेले की बात निराली है। कार्तिक पूर्णिमा के दो दिन पहले शुरू होने वाले इस मेले में बिरादरी की पंचायत पहले मुखिया का चुनाव होता है। पंचायत में इस वर्ष बलिया के ही हरपुर निवासी मानिक चंद मुखिया चुने गए। रात को बिरहा, लोरकी, ललरी व नृत्य के कार्यक्रम होते हैं। मेले में शाम होते ही जातीय नृत्य व गीत सुनायी पड़ने लगते हैं जो देर रात तक चलता रहता है।
वैसे बदलते जमाने के साथ अब इस बिरादरी में भी बदलाव आया है। ठेठ देशी गधों के साथ ही मेले में खच्चर भी बिकने आने लगे हैं, जिनका उपयोग यह बिरादरी अधिक कर रही है।