
गाजियाबाद, [अशोक ओझा]। दिल्ली और उत्तर प्रदेश के बीच परिवहन समझौते में निजी बसें बाधक बनती जा रही हैं। दिल्ली सरकार स्वयं तो उत्तर प्रदेश खासकर नोएडा व ग्रेटर नोएडा में निजी बसें चलाना चाहती है, लेकिन उत्तर प्रदेश की निजी बसों को दिल्ली सीमा में घुसने की अनुमति देने को तैयार नहीं है। इस स्थिति में दोनों राज्यों के बीच होने वाला समझौता खटाई में पड़ता नजर आ रहा है।
बता दें कि दोनों राज्यों में बस संचालन को लेकर हुए विवाद के बाद 17 नवंबर 2006 में उत्तर प्रदेश में डीटीसी बसों को व दिल्ली में उत्तर प्रदेश की बसों को जब्त कर लिया गया था। तब उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम ने अपनी बसें दिल्ली भेजनी बंद कर दी थीं। करीब छह माह तक दोनों राज्यों की सीमा पर जंग के हालात बन गए थे। प्रदेश में नई सरकार बनने के बाद मई 2007 में दोनों राज्यों के अधिकारी और परिवहन मंत्री फिर आमने-सामने बैठे, जिसके बाद बसों का संचालन शुरू हुआ। बस संचालन शुरू होने से पूर्व समझौते पर मौखिक सहमति बनी और तय हुआ कि जल्द ही दोनों राज्यों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर हो जाएंगे लेकिन निजी बसों के संचालन को लेकर विवाद शुरू हो गया।
दिल्ली सरकार ने 24 जुलाई 2008 को समझौते के मसविदे में अपनी निजी बसें पूर्व की भांति चलाने की बात भी शामिल कर दी। अब उत्तर प्रदेश के परिवहन विभाग इस पर अड़ गया है कि दिल्ली की निजी बसें प्रदेश में आएगी तो उत्तर प्रदेश की दिल्ली में क्यों नहीं जाएंगी।
उप परिवहन आयुक्त विनोद शंकर सिंह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार दिल्ली में बस संचालन के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को मानने को तैयार है तो निजी बसों को अनुमति देने में दिल्ली सरकार को परेशानी नहीं होनी चाहिए। शनिवार को हुई एनसीआर बोर्ड की बैठक में भी अध्यक्ष भूरेलाल ने कहा वार्ता के माध्यम से यह मुद्दा सुलझाना चाहिए।