
ऊधमपुर [संतोष कुमार सिंह]। बीमारियों से लड़ते हुए प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शहद की मिठास बरकरार रखने वाली इटली से आई मधुमक्खी अब अपना अस्तित्व बचाने को संघर्ष कर रही हैं। वह न सिर्फ पहले से छोटी हो गई है, बल्कि उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम होने लगी है।
मधुमक्खियों पर अस्सी के दशक में थाइसेक्ट ब्रूड का कहर शुरू हुआ था, जिससे भारतीय मधुमक्खी एपिस सेरेना इंडिका खत्म होने के कगार पर पहुंच गई थी। अन्य प्रजाति की मधुमक्खियों पर भी इस बीमारी का कहर था, जबकि इटली में पाई जाने वाली एपिस मेलिफेरा इससे अछूती थी। इसलिए यह देश के अन्य हिस्सों की तरह रियासत में भी लाई गई।
मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता होने के साथ ही देसी मधुमक्खी से आकार में लगभग 25 प्रतिशत बड़ी और दोगुना शहद देने, प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने छत्ते को नहीं छोड़ने, छत्ते की खुद सफाई करने की आदत व पालकों पर अपेक्षाकृत कम आक्रमण करने तथा विशेष भोजन के सहारे एक ही स्थान पर पूरे साल रह लेने की वजह से इटली की रानी मधुमक्खी पालकों की प्रिय बन गई। और देखते ही देखते मधुमक्खी पालन में 90 प्रतिशत हिस्सा इसकी हो गई।
लगभग दो दशक तक तो इटली की रानी अपनी मिठास से रियासत को सराबोर करती रही, लेकिन अब यह दुबली होने लगी है। स्थिति की गंभीरता का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक समय इसकी 40 हजार कालोनी थी, जो अब मात्र 14 हजार के आसपास रह गई हैं।
मधुमक्खी पालन विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार इसके आकार में लगभग 10 प्रतिशत की कमी आई है। इससे इसकी शहद उत्पादन क्षमता भी कम हुई है। इसके साथ ही इटली की रानी में पहले जैसी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी नहीं रही। इस बारे में ऊधमपुर के मधुमक्खी पालन विकास अधिकारी केएस सम्याल का कहना है कि कई मधुमक्खी पालक एपिस सेरेना इंडिका के फ्रेम [छत्ते] में ही एपिस मेलिफेरा को रखते है, जिससे इसके आकार व रोग प्रतिरोधक क्षमता पर असर पड़ रहा है। इसलिए पालकों को कंप्यूटराइज्ड स्टेडर्ड कम फाउंडेशन शीट का प्रयोग करना चाहिए। इसके साथ ही स्कास्ट को भी एपिस मेलिफेरा की गुणवत्ता को बरकरार रखने के लिए काम करना चाहिए।
स्कास्ट के असिस्टेट प्रो. एंटोमलाजी डा. दविंद्र शर्मा का भी मानना है कि एपिस मेलिफेरा की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है। इस पर यूरोपिया फोल ब्रूड, थाई सेक, ब्रेवा माइट का हमला हो रहा है। इसके साथ ही मधुमक्खियों के लिए काल बनी थाइसेक्ट ब्रूड इस बार भी हमला कर रही है। इस बारे में पहले ही कृषि विभाग को आगाह कर दिया गया है।
उन्होंने कहा कि किसान मधुमक्खियों को लेकर पंजाब, राजस्थान आदि प्रदेशों में जाते है। जहां से ब्रेवा माइट की बीमारी रियासत में आ रही है। इसलिए माइग्रेशन पर विशेष सतर्कता की जरूरत है।
मधुमक्खी विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को फ्रेम बदलने से बचने के साथ ही इसकी स्वच्छता पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए, ताकि इटली की रानी सेहतमंद रहकर रियासतवासियों को शहद की मिठास देती रहे।