
देहरादून [जासं]। हिंदी के युवा कवि राजेश सकलानी की एक चर्चित कविता है 'सुनता हूं पानी गिरने की आवाज', मगर अब देश के भूगर्भ वैज्ञानिक भी पानी गिरने की आवाज से भूकंप के संकेत पाने में सफल हो रहे हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने जमीन की गहराई में मौजूद पानी यानी भूजल की खदबदाहट [या कहें तो हलचल] से आगामी भूकंप की भविष्यवाणी की दिशा में अहम सफलता हासिल की है।
बस वैज्ञानिक करते यह हैं कि किसी भूकंपीय क्षेत्र में 250 मीटर या उससे भी गहरे बोरवेल खोद देते हैं, जिनसे भूकंप के वक्त भूजल के स्तर में उतार चढ़ाव को दर्ज कर लेते हैं। इसी तरह का एक बोरवेल दून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलाजी की टिहरी जिले में स्थित मल्टी पैरामीटर जियोफिजल लैब में भी लगाया गया है।
बोरवेल के जरिए भूकंपों के पूर्वानुमान पर काम कर रहे हैदराबाद स्थित नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ भूगर्भशास्त्री डा. आरके चड्ढा ने महाराष्ट्र के कोयना बांध क्षेत्र में जर्मनी के सहयोग से 20 बोरवेल होल के जरिए वहां भूकंप के पूर्वानुमान की दिशा में सफलता पाई है।
वाडिया संस्थान में भूकंपों के पूर्वानुमान पर राष्ट्रीय कार्यशाला में हिस्सा लेने पहुंचे डा. चड्ढा कहते हैं कि दरअसल जब भूकंप आते है या आने वाले होते हैं तो जमीन की गहराई में मौजूद चंट्टानों में हलचल होती है। वे या तो फैलती हैं या सिकुड़ती हैं। इस हलचल का प्रभाव गहरे भूजल के स्तर पर दिखता है। भूजल स्तर में उतार-चढ़ाव के जरिए आने वाले भूकंप के संकेत पाए जा सकते हैं।
कृत्रिम जलाशयों से पैदा भूकंपों की हो सकती है भविष्यवाणी
भारत ने कृत्रिम जलाशयों से पैदा होने वाले भूकंपों की भविष्यवाणी करने में सफलता पा ली है। एनजीआरआई के राजा रमन्ना फैलो व सामुद्रिक विकास विभाग के पूर्व सचिव डा. हर्ष के गुप्ता ने तो 2006 में महाराष्ट्र के कृत्रिम कोयना जलाशय के भूकंप की सटीक भविष्यवाणी कर दी थी।
दून में भूकंप पूर्वानुमान पर चल रही राष्ट्रीय कार्यशाला में शिरकत करने पहुंते डा. हर्ष के गुप्ता ने बताया कि कोयना क्षेत्र में स्थित सात भूकंप वेधशालाओं से मिले आंकड़ों के विश्लेषण के बाद 16 मई 2006 को उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि 15 दिन के भीतर कोयना क्षेत्र में चार रिक्टर स्केल की तीव्रता वाला भूकंप आ सकता है। 21 मई को ही इस क्षेत्र में 4.2 तीव्रता का भूकंप आ गया था।