
सासाराम [कार्यालय प्रतिनिधि]। सासाराम जिले के मछुआरों की जिंदगी भी जल बिन तड़पती मछलियों की तरह हो गई है। इनके नाम पर चलाई गई योजनाएं महज कुछ लोगों की तिजोरियों को भरने का साधन बन गई है।
मछुआरे कहते भी है-साहब! जिस तरह मछली बिना पानी के तड़पती है उसी तरह हम भी गरीबी की मार से तड़पते है। न तो तालाब बचे हैं, ना ही मजदूरी करने की उम्र। बड़े लोगों की शगल बन कर रह गई हैं सरकारी योजनाएं। स्थानीय लखुनसराय निवासी 70 वर्षीय मछुआरे मोती चौधरी की बातों में कटु यथार्थ है। जीवन की सच्चाई और लाल फीताशाही की झलक है। मछुआरों के लिए बनीं सरकारी योजनाएं कागज से धरातल पर उतर ही नहीं पातीं।
बेसलाल चौधरी हाथ में जाल लेकर सुबह मछली की तलाश में निकल जाता है। यह भी पता नहीं कि कहां और किसके लिए मछली मारेगा? हीरा चौधरी को भी एक रुपये भी सरकारी सहायता नहीं मिली। 70 रुपये में मजदूरी कर पूरे परिवार का पेट पालते है। घर दिखाते हुए कहते है कि इसे गिरे महीनों हो गए। इंदिरा आवास तक नसीब नहीं है।
मछुआरों की इस बस्ती में न तो किसी के पास मछली मारने का तालाब है और न रोजगार का साधन। हीरा, बेसलाल और मोती सरकारी योजनाओं से वंचित रहने वाले अकेले नहीं हैं। इन जैसे पांच हजार से अधिक मछुआरे जीवन जीने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं, लेकिन इनकी जिंदगी मछली पकड़ने वाले जाल की तरह उलझकर रह गयी है।
मत्स्य विभाग ने मछुआरों के लिए 'जनश्री बीमा योजना' प्रारंभ किया है। इसका लाभ दो दर्जन को भी नहीं मिला। बीमा योजना के तहत गरीब मछुआरों ंकी स्वाभाविक मौत पर 30 हजार, दुर्घटना में मृत्यु होने पर 75 हजार, विकलांगता की स्थिति में 37 हजार रुपये देने के प्रावधान हैं। बीमित सदस्यों के बच्चों को नौ से 12 तक की कक्षा के लिए 12 सौ रुपये वार्षिक दिया जाना है। लेकिन विभाग को इनका बीमा कराने से परहेज है।
सूत्रों की मानें तो कैमूर व रोहतास जिला मिलाकर अब तक 70 मछुआरों का जनश्री बीमा किया गया है। जिसमें सर्वाधिक कैमूर के हैं। इस जिले के 1247 जलकरों में से अधिकांश की बंदोबस्ती की गई। लेकिन उसमें भी मछुआरों की संख्या नगण्य है। उसपर भी दबंगों का कब्जा है। मत्स्यजीवी सहयोग समिति बना कई सफेदपोश भी मछुआरों का हक मार रहे हैं।
सासाराम प्रखंड में दो, शिवसागर, चेनारी, नोखा में तीन-तीन, करगहर, कोचस व दिनारा में दो-दो तथा अकोढ़ीगोला, रोहतास व डेहरी में एक-एक समितियों का गठन किया गया है। समितियां अमूमन 50 से सौ जलकरों की नीलामी लेकर मछुआरों को अपने तरीके से काम करा रही हैं।
सासाराम समिति के पूर्व मंत्री मोहन चौधरी की मानें तो विभाग और सफेदपोश मिलकर मछुआरों को तड़पा रहे हैं।