राजपथ पर जन संस्कृति का कोरस भारतीय

 
Nov 04, 12:00 pm

पटना। मैं खड़ा हूं पाटलिपुत्र के राजपथ [बेली रोड] पर। उस माटी पर जिसमें न केवल इतिहास की सुनहरी कौंध है, बल्कि संस्कृति और परंपराओं का खिलखिलाता हुआ आगन भी है। इसी राजपथ के एक किनारे सृजन में लगे उन कलाकारों को भी मैं देख रहा हूं जो समग्र बिहार की सृष्टि के लिए माटी गूंथ रहे हैं। बहुत थोड़े समय में यहा नये अशोक स्तंभ की प्रतिकृति पूरी तरह तैयार हो जाएगी, जिसके मस्तूल पर सिंह [अशोक स्तंभ की तरह ही] तो है ही पैडस्टल पर बिहारी लोक गीत-नृत्य और संस्कृति का कोरस भी मिट्टी और सीमेंट की आकृति में उतर रहा है।

पटना की माटी पर बन रहे 21वीं सदी के इस स्तूप का कण-कण अपनी विशिष्टताओं से युक्त है। अशोक ने केवल बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए स्तंभ बनवाए, लेकिन राज्य सरकार के मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग की ओर से बन रहे इस स्तूप में सर्वधर्म समभाव के चिह्न लगे हैं। इतिहासविद् बताते हैं कि ईसा से तकरीबन 300 वर्ष पूर्व अशोक ने जो स्तंभ बनाये उनमें दो स्तंभ बिहार के वैशाली और पश्चिम चंपारण [नंदनगढ़, लौरिया] में भी बने। इतिहास की श्रृंखला से यह स्तंभ कितना जुड़ेगा, नहीं मालूम लेकिन इतिहास के वृहद पृष्ठों को अपने में संजोने में जरुर कामयाब हुआ है। इस स्तंभ में 1857 की क्राति और 1942 के भारत छोड़ो आदोलन की स्मृतियों पर आधारित भित्ति चित्र-रिलीफ वर्क तो किए ही गए हैं।

आजादी के इतिहास की इस कड़ी में पटना को भी पिरोया गया है। पीर अली की फासी को भी कलाकारों ने उकेरा है। पटना में अर्से पूर्व देवीप्रसाद राय चौधुरी के बनाये गये सात शहीद की अनुकृति भी इस स्तंभ के पैडस्टल में जगह पा चुकी है। बुद्ध मूर्ति के साथ ही स्तंभ में मूर्तिशिल्प के अन्य नमूने भी बेजोड़ हैं। कलाओं के रूप विभिन्न हैं, उनके संदेश भी देश-काल रीति के अनुरूप अलग-अलग होते हैं और कभी-कभी सभी कलाओं का मिलकर एक संदेश होता है। नृत्य-गान, मूर्ति या कैनवास पर उकेरी गयी कोई पेंटिंग-सभी सृष्टि के मूल छंद को पकड़ना चाहती है।

पटना आर्ट कालेज के कलाकारों ने नि:संदेह ऐसा कुछ ही यहा भी किया। तभी तो मिथिला का समा चकेबा हो, अंग प्रदेश का विषहरी गीत, कोसी के हिस्से में डूबकर गाने वाला भगैत, मध्य बिहार की कजरी, कीर्तन सब इस स्तंभ के पैडस्टल पर आपस में साझेदारी कर रहे हैं। मूर्ति शिल्प में किसान के संपूर्ण परिवार को दिखाया गया है। माथे पर बोझ उठाती पत्नी और काधे पर कुदाल लिए किसान के साथ उसका बेटा, पूरा परिवार किसानी जीवटता का प्रतीक है।

पड़ोस में एक मा सूत कातती-बनुती मानव श्रम की द्योतक है। ठीक उसके बगल में ढोलक की थाप सन्नाटे में भी गूंजती नजर आ रही है। कई मूर्तिया, सबके अलग-अलग भाव और संदेश लेकिन सबमें बिहारी संस्कृति के अक्स। पूरे स्तंभ की परिकल्पना राज्य अभिलेखाकार के अभिलेख सलाहकार हेमंत ने की है। पटना आर्ट कालेज के प्राचार्य अनुनय चौबे और प्राध्यापक रामूजी के नेतृत्व में इसी कालेज के छात्र इस स्तंभ को तैयार कर रहे हैं। रामूजी बताते हैं कि स्कल्पचर तैयार हो चुके हैं, बस रंग-रोगन का काम अभी शेष है।




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