
क्या आपको फिल्म स्लमडॉग मिलेनियम का वह सीन याद है, जिसमें फिल्म के दो केंद्रीय किरदार जमाल और सलीम बचपन में भटकते हुए ताजमहल पहुंच जाते हैं। यहीं पर गरीबी से जूझते दोनों भाई बिना किसी तजुर्बे के गाइड बन जाते हैं। इन अनपढ़ भाइयों का न तो इतिहास से कोई सरोकार था और न ही ताजमहल से। इसलिए इनके मन में जो आता वही टूटी-फूटी इंगलिश और हिंदी में टूरिस्ट को बयां कर देते। ऑस्कर अवार्ड के लिए नोमिनेट इस फिल्म के इस सीन के बाद अब हम रूख करते हैं असल जिंदगी की ओर। जहां लोगों को विरासत में इतिहास मिला है। मुगलिया शान और शौकत की दास्तां तो इनकी जुबां पर इस तरह से चढ़ी रहती हैं, मानो ये खुद उसके साक्षी रहे हों। जी हां, हम आपको ऐसी ही जगह लोगों से रूबरू करा रहे हैं जो पांच रुपये में पांच सौ साल का इतिहास जुबानी बताते हैं। तो आइए शुरू करते हैं भारतीय इतिहास को समेटे विश्वदाय स्मारक फतेहपुर सीकरी का सफर।
सीन वन : मुगलों की राजधानी रही फतेहपुर सीकरी की तरफ जैसे ही कार टर्न लेती है, वैसे ही 10-11 साल से 55-60 साल तक गाइडों का झुंड कार पर टूट पड़ता है।
सर.सर..सर, फतेहपुर सीकरी जा रहे हैं। गाइड चाहिए..गाइड. सर, बिना गाइड के घूमना बेकार होगा। दो दर्जन से ज्यादा स्मारक हैं। सौ रुपये दे दीजिए। बुलंद दरवाजे से लेकर शेख सलीम चिश्ती की दरगाह, जोधाबाई का महल, पंचमहल सब घूमा दूंगा। अच्छा चलिए..पचास ही दे दीजिए। क्या सर, इतने तो ठीक हैं। अच्छा..बीस.दस. अच्छा चलो पांच रुपये तो दे दोगे। यही कहते-कहते एक 11 साल का छोटा सा गाइड टूरिस्ट की कार में बैठ जाता है। दूसरे गाइडों का झुंड दूसरी कार की तलाश में फिर सड़क किनारे खड़े जाता है।
सीन टू : [कार में बैठे-बैठ]'सर, फतेहपुर सीकरी आगरा से लगभग 35 किलोमीटर दूर है। इसे मुगल बादशाह अकबर ने बसाया था। वैसे बाबर ने भी अपनी पुस्तक 'तुजक-ए-बाबरी' में फतेहपुर सीकरी का जिक्र किया है। एक और बात सर, शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से सलीम के पैदा होने के बाद अकबर ने फतेहपुर सीकरी को राजधानी बना लिया था।
[कार से उतरे ही..शेख सलीम चिश्ती की दरगाह के सामने]
सर, इस दरगाह पर जो भी सच्चे मन से दुआ मांगता है वह कभी खाली नहीं जाती। और..ये देखिए सर, ये सामने है बुलंद दरवाजा। इसकी जमीन से ऊंचाई 176 फीट है। जिस प्लेटफॉर्म पर ये बना है उसकी ऊंचाई 134 फीट है। सर, इसके अलावा फतेहपुर सीकरी में दो दर्जन से अधिक बिल्डिंग हैं। जिसमें दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, टकसाल, ज्योतिषी की बैठक, चिकित्सालय, पंच महल, शहजादों का मकतब, तुर्की सुल्ताना का महल, जोधाबाई का महल, मरियम की कोठी, बीरबल का निवास, शाही अस्तबल, अबुलफजल का घर, जामा मस्जिद, बुलंद दरवाजा, हिरन मीनार आदि हैं।
.. एक ही सांस में इतना सब कुछ बता गया लगभग 11 वर्षीय छोटा सा गाइड। इस छोटे से गाइड ने दूसरे गाइडों की तरह से न तो गाइडिंग की कोई तालीम ली है और न ही इतिहास पढ़ा है। अपने बुजुर्गो से जो सुना, वही कंठस्थ कर लिया. दादा-दादी भी जो कहानियां सुनाते वह भी मुगलिया सल्तनत का अहसास कराती थी। इन्हीं सबसे ये फतेहपुर सीकरी के बारे में इतना जान गए कि इतिहास की किताबें पीछे छूट गई। यही कारण है कि एप्रूव्ड गाइड पढ़ने के बाद भी फतेहपुर सीकरी के बारे में शायद इतना सबकुछ नहीं जाते। इनके अनुभव ने ही इनको ट्रेंड कर दिया है। अब यही इतिहास उनकी रोजी-रोटी का सहारा बना हुआ है। खारे पानी की वजह से फतेहपुर सीकरी मुगलिया काल से ही हाशिए पर रहा है। भले ही ये मुगलों की राजधानी रही हो लेकिन आज भी यहां हालात वैसे ही हैं। रोजगार के नाम पर यहां सिवाय इस बुलंद दरवाजे की बुलंदी के, कोई दूसरा चारा नहीं है। खेती-बारी है लेकिन खारे पानी की वजह से वह भी कारगर नहीं है। फतेहपुर और सीकरी दो अलग-अलग कस्बे हैं। दोनों की आबादी एक लाख से ज्यादा है। ऐसे में बुलंद दरवाजे के साये तले रह रहे लोगों के लिए यही इमारत रोजगार का साधन बनी हुई है। हजारों लोग इस इमारत से जुड़े हुए हैं। इसमें 10 साल की उम्र के बच्चों से लेकर साठ साल के बुजुर्ग तक हैं। बिना पढ़े-लिखे गाइड भी आज अच्छे गाइड बने गए. असलम इन्हीं में से एक हैं। इन्होंने भी कहीं कोई तालीम हासिल नहीं की लेकिन बुलंद दरवाजा, शेख सलीम चिश्ती की दरगाह सहित अन्य इमारतों का इतिहास ऐसे बयां करते हैं मानो इन्हीं के सामने सब तामीर हुआ हो।
कई भाषाएं सीख गए
ये लोग इंगलिश के अलावा जर्मन और फ्रेंच भी टूरिस्ट को बखूबी हेडिंल करते हैं। फतेहपुर सीकरी में लगभग पांच सौ गाइड हैं। एप्रूव्ड गाइड जहां एक घंटे का लगभग छह सौ रुपये चार्ज करता है, वहीं लोकल गाइड पांच रुपये में हंसते-हंसते तैयार हो जाते हैं।
अलग हटकर इतिहास
इन लोकल गाइडों की और भी कई खासियत हैं। जैसे कि कोई बाहर का गाइड सिर्फ इतिहास से संबंधित जानकारी ही टूरिस्ट को दे सकते हैं। जबकि यहां के लोकल गाइड कहानियों के माध्यम से ऐसी कई रोचक जानकारी उपलब्ध कराते हैं जो शायद किसी किताब में नहीं होती। [जेएनएन]