
सहारनपुर, [एम रियाज़ हाशमी]। इसी साल की शुरुआत में दारुल उलूम ने फतवा जारी किया था कि बाबा राम देव का योग गैर इस्लामिक यानी शरीयत के मुताबिक नहीं है। वंदेमातरम गान के मुद्दे पर भी उलेमा और रामदेव के विचार अलग हैं। इस पर जमीयत उलेमा हिंद के ताजा प्रस्ताव को बाबा रामदेव ने किनारे कर दिया और जब वे उलेमा के मंच पर आ गये तो उनके योग के वास्ते भी शरई दायरे की तलाश कर ली गई।
सवाल उठ रहा है कि विवादित मुद्दे आखिर किस मकसद की वजह से छू मंतर हुए हैं। फिलहाल जमीयत और बाबा रामदेव के साझे मंच ने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। जमीयत और बाबा की पतंजलि योग पीठ के पास सियासत के लिए वांछित जरूरी भीड़ मौजूद है। दो आवाजें भविष्य में एक हो जाएं तो किसी को चौंकना नहीं चाहिए। जमीयत जो प्रस्ताव पास करती है उस पर कोई सरकार कान नहीं धरती। बाबा रामदेव लगातार काला धन स्वदेश लाने की बात कर रहे हैं लेकिन सरकार कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही। उनकी भले ही कोई सियासी महत्वाकांक्षा न हो लेकिन उनका मकसद हासिल करने का रास्ता सियासी गलियारों से होकर गुजरता है।
जनवरी में दारुल उलूम से जारी फतवे में कहा गया था, 'योग गुरू बाबा रामदेव की संगत से मुस्लिमों को बचना चाहिए। उनकी योग प्रक्रिया गैर इस्लामिक है।' ओम शब्द के उच्चारण पर ज्यादा आपत्ति थी। तब बाबा रामदेव ने कहा था कि ओम और अल्लाह में फर्क क्या है? जिन्हें ओम नहीं बोलना है, न बोलें। वे अल्लाह या आमीन बोल सकते हैं। बाबा रामदेव का तर्क वाजिब था। तभी तो उन्होंने जमीयत सम्मेलन में कहा कि नमाज भी योग क्रिया ही है।
योग के बारे में पूछने पर बुधवार को दारुल उलूम वक्फ के फतवा विभाग के नायब प्रभारी मुफ्ती अहसान कासमी ने कहा, 'योग में गैर शरई चीजें यथा सूर्य नमस्कार आदि जायज नहीं हैं। गैर शरई क्रियाओं को छोड़कर योग किया जा सकता है। चिकित्सक स्वस्थ रहने के वास्ते योग क्रिया करने को कहते हैं तो कोई हर्ज नहीं है। वैसे भी योग एक कसरत है और इस्लाम में सेहत को प्राथमिकता दी गई है।' बाबा रामदेव जब जमीयत के मंच पर देवबंद में मंगलवार को पहुंचे थे तो यह माना जा रहा था कि वे 'वंदेमातरम' पर कुछ जरूर कहेंगे। उन्होंने ऐसा नहीं किया।