
झंझारपुर, मधुबनी [विनय पंकज/सुनील मिश्र]। मार्गदर्शन का अभाव, प्रोत्साहन की कमी, समुचित प्लेटफार्म का नहीं मिलना उन्हें गुमनामी के 'ब्लैक होल' में डालता जा रहा है। उनके दनादन रन उगलने वाले बल्ले सुस्त पड़ गए हैं, विकेट चटकाने पर 'हाउ इज दैट..' की अपील का दमदार जोश भी काफूर होता जा रहा है।
झंझारपुर प्रखंड मुख्यालय से सात किमी उत्तर स्थित चनौरागंज पंचायत के मलिछाम गांव की तीन सगी प्रतिभावान खिलाड़ी बहनें साखी, मीनाक्षी और चिंटू आज मोहभंग की मनोदशा में हैं। क्रिकेट सहित वालीबाल, कबड्डी, बैडमिंटन व एथलेटिक्स में पारंगत इन 'हीरों' को परखकर उन्हें तराशने वाले जौहरी कहीं नजर नहीं आ रहे।
महिला क्रिकेट में कटिहार, भागलपुर सहित पड़ोसी राष्ट्र नेपाल तक में जलवा दिखाने वाली इन बहनों की प्रैक्टिस के लिए एक अदद पिच, ढंग की किट तथा नेट तक मयस्सर नहीं है। आज भी घर के समीप आम की गाछी [बगीचा] का स्तरहीन मैदान ही इनकी अभ्यासस्थली है, जहां वे जुटी तो नजर आती हैं, मगर यह सिलसिला कब तक जारी रह पाएगा, कहना मुश्किल है।
अभी पिछले महीने अक्टूबर में भागलपुर में राज्यस्तरीय प्रतियोगिता के दौरान इन बहनों ने शिरकत की थी। इसके पूर्व बेतिया में हुए महिला महोत्सव में भी कबड्डी व एथलेटिक्स की स्पद्र्धाओं में उन्होंने हिस्सा लिया था। साखी कहती है कि हर जगह उसे उचित कोचिंग का अभाव खटका। मीनाक्षी व चिंटू भी एक सुर में इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी को आगे बढ़ने की राह में रोड़ा बताती हैं।
क्रिकेटर व फुटबालर रह चुके पिता गुणेश्वर चौधरी उर्फ भरत जी ही बच्चियों की कोचिंग का जिम्मा संभाले हुए हैं।
पिता कहते हैं, तमन्ना के आड़े है अर्थाभाव
क्रिकेटर बहनों के पिता गुणेश्वर चौधरी उर्फ भरत जी ठंडी आहें भर कहते हैं कि तीनों बेटियों को और अधिक प्रोफेशनल ढंग से तैयार करने की जरूरत है, जो नहीं हो पा रहा। तकरीबन साल भर पहले विधान पार्षद [वर्तमान में विधान परिषद उप सभापति] वीरेन्द्र चौधरी ने माकूल क्रिकेट पिच तैयार कराने के वास्ते 75 हजार रुपये की स्वीकृति और फिर बाद में अनुशंसा भी कर दी थी, मगर वह फाइल अब तक सरकारी कार्यालयों की गर्द ही फांक रही है।
वे कहते हैं कि घर के आगे इनके लिए निजी खर्च से ही कम से कम बैडमिंटन व वालीबाल कोर्ट तैयार कर देने की जद्दोजहद में वे हैं, किन्तु अर्थाभाव आड़े आ रहा है।
मां कहती हैं, अधूरा रह जाएगा दादा का सपना!
साखी, मीनाक्षी और चिंटू की माता राजो देवी रुंधे गले से बताती हैं कि बड़े जतन से लाड़लियों के खेल प्रेम को वे सिंचित करती आई हैं। रूढ़ीवादी परिवेश को नजरअंदाज कर उन्होंने बेटियों की प्रतिभा को बढ़ावा तो दिया, पर आज सहारे के अभाव में उन्हें मुरझाता देखना बड़ी पीड़ा देता है। खेल प्रतियोगिताओं में बाहर जाने के लिए हजारों की राशि खर्च होती है, जिसका निजी तौर पर वहन मुश्किल हो जाता है।
ऐसे में बच्चियों के दादा लक्ष्मण चौधरी का खेल जगत में पोतियों के ऊंचे मुकाम का सपना भी लगता है अधूरा ही रह जाएगा।