
नई दिल्ली [अनिल आजाद पांडे]। आने वाले दो दशक समूची दुनिया के लिए आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक लिहाज से काफी महत्वपूर्ण साबित होने जा रहे हैं। जनसंख्या और क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया में सबसे ऊपर कायम एशिया की दो प्रमुख ताकतों चीन और भारत की भूमिका भी ऐसे में अहम हो जाती है।
पिछले कुछ वर्षो में इन दोनों देशों खासकर चीन ने जिस तेजी से अपने कदम आगे बढ़ाए हैं, उसे देखकर अमेरिका की भी चूलें हिलने लगी हैं। आर्थिक संकट के इस दौर में आठ फीसदी की जीडीपी दर बनाए रखना कोई आसान बात नहीं है। इतना ही नहीं, अमेरिका चीन का कर्जदार हो गया है। उसे चीन से 800 अरब डालर उधार लेने पड़े हैं।
हालाकि जानकार भारत को भी चीन के साथ आर्थिक महाशक्ति बनने की दौड़ में शामिल मानते हैं। पिछले एक दशक में जिस तरह से आईटी, फार्मा, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों की ग्लोबल स्वीकार्यता बड़ी है, उससे उम्मीद लगाना बेमानी नहीं होगा, मगर भुखमरी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, आतंकवाद जैसी तमाम समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। इनसे निबटे बिना विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होना एक ख्वाब-सा लगता है।
गौरतलब है कि इन दोनों पड़ोसियों ने साथ-साथ [1947 और 1949] खुली हवा में सास लेना शुरू किया, लेकिन कम्युनिस्ट देश चीन तकनीक, ढांचागत विकास और रक्षा मामले में भारत से आगे निकल गया। चीन ने अब औद्योगीकरण, बाजारीकरण व शहरीकरण में भी तरक्की कर ली है।
काफी समय तक बिजनेस बिरादरी से अलग-थलग रहे चीन ने अब एक महत्वपूर्ण वैश्विक बिजनेस प्लेयर के रूप में कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। पिछले दिनों चीनी राष्ट्रपति हू जिन ताओ संयुक्त राष्ट्र सभा को संबोधित करने पहुंचे। 38 सालों में पहली बार चीन का कोई नेता इस मंच पर उपस्थित हुआ। यह इस बात का संकेत है कि चीन को अब अपने विकास की चिंता सताने लगी है। चीनी अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का एक संकेत है।
एक तरह से चीन अमेरिका व अन्य देशों के बीच के अंतर को भरने की कोशिश कर रहा है। विशेषकर अफ्रीकी देशों को खुलकर सहायता दे रहा है। चीन का विदेशी सहायता कार्यक्रम वर्ष 2007 में 25 अरब डालर को पार कर चुका है, जबकि वर्ष 2002 में यह महज एक अरब डालर से भी कम था।
विश्लेषकों का अनुमान है कि इस साल चीन की जीडीपी दर आठ प्रतिशत या उससे ऊपर पहुंच सकती है, जबकि अमेरिका, कनाडा जैसे देशों की जीडीपी नेगेटिव में होने की आशंका है। चीन अब विश्व व्यापार संगठन [डब्ल्यूटीओ], संयुक्त राष्ट्र में भी अपना प्रभाव दिखाने लगा है। वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के असंतुलन को दूर करने के लिए भी कोशिश में लग गया है।
रक्षा जगत में भी चीन मजबूती से कदम बढ़ा रहा है। उसके रक्षा बजट पर ही नजर डालें तो जहां वर्ष 2000 में यह 14.6 अरब डालर था। उसके बाद हर साल इसमें लगभग 17 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है। मार्च 2009 में बजट 70.27 अरब डालर हो गया है।
बताया जाता है कि इसमें वह अपने कई तरह के रक्षा खर्च, महत्वपूर्ण बलों व तमाम बड़े रक्षा सौदो, मिलिट्री शोध और विकास, अर्द्ध सैनिक बलों के खर्च को नहीं दर्शाता। वैसे इस समय चीन के पास 11 न्यूक्लियर पावर प्लाट्स हैं, जबकि 24 अभी निर्माणाधीन हैं। वह अपनी रक्षा शक्ति बढ़ाने पर कितना जोर दे रहा है, इसका उदाहरण यह है कि उसने रक्षा व अर्थव्यवस्था के समन्वित विकास के लिए श्वेत पत्र भी जारी किया है।
2005 में चीन ने घोषणा की कि हर वर्ष वह अपने मिलिट्री खर्च का बजट कम से कम अगले 15 सालों तक दोहरे अंकों में बढ़ाएगा। यहां बता दें कि 1990 से 2005 के बीच चीन का रक्षा बजट 9.6 प्रतिशत की औसत दर से बढ़ा। इस दौरान जीडीपी दर भी 9.7 के दर से बढ़ी।
दूसरी ओर भारत अपने जीडीपी का सिर्फ दो प्रतिशत रक्षा जरूरतों पर खर्च करता है। उसका इस साल का बजट 29.4 अरब डालर है। वह भी तब, जबकि पिछले वर्ष के मुकाबले 24 प्रतिशत का इजाफा किया गया है। भारत के पास लगभग 15 लाख थल सेना है, वह भी आधुनिक साजोसामान से पूरी तरह सुसज्जित नहीं है। जबकि चीन की 23 लाख पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को आधुनिक हथियारों की खरीद, मिलिट्री ट्रेनिंग के साथ-साथ बेहतरीन सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं।
जानकार मानते हैं कि चीन और भारत दोनों में विश्व की महाशक्तिबनने की क्षमता है। आने वाले दो दशकों में एशिया में इकनामिक मिरेकल [आर्थिक चमत्कार] की उम्मीद की जा सकती है। चीन और भारत आसमान पर भी छाने की तैयारी में हैं। अगले 20 सालों में दुनिया में करीब 3.1 ट्रिलियन डालर की कीमत के 25 हजार नए एरोप्लेन बनाए जाने हैं। इनके सबसे बड़े खरीदार [31 फीसदी] भारत और चीन को माना जा रहा है। इसके बाद यूरोप 25 प्रतिशत है। चीन के एयर ट्रैफिक टर्न ओवर में हर साल 30.6 प्रतिशत की दर से इजाफा हो रहा है। इस साल चीन के उड्डयन उद्योग को 1.7 अरब डालर का लाभ हुआ।
जनसंख्या और क्षेत्रफल के हिसाब से ये दोनों शक्तियां विश्व में अव्वल हैं। दुनिया की 40 फीसदी आबादी भारत और चीन में बसती है। हालाकि एक लिहाज से यह विकास में अवरोध भी बन सकती है, दूसरी तरफ एक शक्तिशाली वर्क फोर्स के रूप में सहायक भी।
गौरतलब है कि कम्युनिस्ट-पूंजीवादी देश चीन की आधी से अधिक जनसंख्या के पास खाने को पर्याप्त भोजन है। वहीं, वर्ष 1990 से अब तक भारत में तीन करोड़ और लोग भुखमरी की श्रेणी में शामिल हो चुके हैं। 46 प्रतिशत बच्चे कम वजनी हैं। नेशनल सैंपल सर्वे आर्गनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक 28 फीसदी लोग नौकरी करने के बाद भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिता रहे हैं।
चीन में गरीबी, बेरोजगारी की समस्या भारत की तुलना में भले ही कम हो, लेकिन इनसे निबटना चीन के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। ग्रामीण क्षेत्रों में 20 करोड़ बेरोजगार हैं, जो शहरों की तरफ पलायन कर रहें हैं।
अगर चीन और भारत इन समस्यायों का समाधान करने में सक्षम हो गए तो आने वाले 20 सालों में विश्व की दो प्रमुख महाशक्तिया दुनिया के सामने मौजूद होंगी, मगर यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और बाजार की प्रतिस्पर्धा एक-दूसरे के लिए किस हद तक मुश्किल पैदा कर सकती है। दिलचस्प सवाल यह भी है कि क्या अमेरिका, जापान, रूस और अन्य देश चीन, भारत से पीछे छूट जाएंगे।
[लेखक चाइना रेडियो से जुडे़ हैं]