
बसंतपुर, सिवान [बुद्धदेव तिवारी]। आजादी की जंग जीतने वाला सिपाही अपनों से ही हार गया। पेंशन तक न मिलने के कारण स्वतंत्रता सेनानी रामेश्वर प्रसाद सिंह इन दिनों मुफलिसी के दौर से गुजर रहे हैं। अफसरों की चौखट नापकर आजिज आ चुके रामेश्वर अब अपना दर्द मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से कहने जनता दरबार जाने की तैयारी में हैं।
सिवान के बसंतपुर प्रखंड की कुमकुमपुर पंचायत के बरवां गांव मनिवासी रामेश्वर सिंह ने 1942 के आंदोलन में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। बसंतपुर थाना और निबंधन कार्यालय जलाने पर वे फिरंगी हुकूमत की आंखों की किरकिरी बन गए थे। देशभक्ति उन्हें विरासत में मिली थी। पिता स्व. कपिलदेव सिंह ने 1926 में बसंतपुर में महात्मा गांधी के आने पर उनकी आगवानी करते हुए उनके लिए अस्थाई शिविर का निर्माण कराया था, तिरंगा तले सैकड़ों लोगों ने कांग्रेस की सदस्यता ली थी।
सांप्रदायिक सद्भाव के समर्थक रहे इस जमींदार परिवार ने अपनी 10 कट्ठा जमीन मुसलमानों को दे दी थी। घर में संपन्नता थी, इसलिए आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानी पेंशन के लिए कोई प्रयास नहीं किया। समय बदला और संपन्नता जाती रही। अब उनके पास पांच बीघा जमीन है जिसमें दो बीघा जलजमाव के कारण बेकार है। जर्जर होने के बावजूद जमींदारी के वक्त का मकान गुजरे जमाने की स्मृतियों को संजोए हुए है।
रामेश्वर सिंह आज 86 वर्ष हैं। जीवन के अंतिम पड़ाव में उन्हें पैसे की कमी खल रही है। एक माह पहले गिरने से उनके पैर में गहरा घाव है। इलाज का अतिरिक्त खर्च वहन करते हुए वे किसी तरह परिवार का भरण-पोषण कर रहे है। उनका कहना है कि जमींदारी के जमाने में यह नही सोचा था कि कभी ऐसे दिन भी देखने को मिलेंगे। वे अब स्वतंत्रता सेनानी पेंशन पाने का प्रयास कर रहे हैं तो बीडीओ और डीएम गंभीर नहीं हैं।
बीडीओ सुनील कुमार ने कहा कि स्वतंत्रता सेनानी पेंशन दिलाना उनके वश में नहीं है। जबकि जिलाधिकारी बालामुरुगन डी ने कहा कि इस मामले की उन्हें जानकारी नहीं है।