घट रही है सेक्सोफोन की लोकप्रियता

 
Nov 05, 12:47 pm

नई दिल्ली। पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत की दुनिया में बेहद अहम स्थान रखने के बावजूद सेक्सोफोन नामक वाद्य यंत्र को पर्याप्त सम्मान नहीं मिला और हिंदुस्तान में तो सेक्सोफोन की स्थिति और भी कमजोर है।

राजधानी के बेहद प्रतिष्ठित दिल्ली स्कूल आफ म्यूजिक के प्रिंसीपल जसपाल सिंह ने बताया कि सेक्सोफोन की लोकप्रियता दिनों-दिन घट रही है क्योंकि की बोर्ड के जादू ने न केवल सेक्सोफोन बल्कि अन्य कई महत्वपूर्ण वाद्य यंत्रों को ग्रहण लगा दिया है। वह कहते हैं कि कंसर्ट और लाइव प्रोग्राम में सेक्सोफोन के बजाय की बोर्ड प्लेयर को अधिक तरजीह दी जाती है क्योंकि एक की बोर्ड से वह एक ही समय में कई वाद्य यंत्रों की ध्वनियां निकाल सकता है जबकि सेक्सोफोन में एक ध्वनि के सिवाय कोई विकल्प नहीं होता।

अन्य वाद्य यंत्रों की तुलना में सेक्सोफोन का इतिहास बहुत अधिक पुराना नहीं है। बेल्जियाई संगीतकार और संगीत वाद्य यंत्र बनाने वाले ऐडोफे सेक्स ने 1840 में सेक्सोफोन इजाद किया था। ऐडोफ खुद शुरुआत में क्लेरनेट बजाते थे और पेरिस में संगीत जगत में उनका नाम काफी सम्मान से लिया जाता था। वह ब्रसेल्स में अपने पिता की संगीत वाद्य यंत्रों की दुकान में काम करते थे और उसी दौरान उन्होंने सेक्सोफोन को विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया।

28 जून 1846 को एडोफे ने सेक्सोफोन का 15 साल के लिए पेटेंट अधिकार हासिल किया। 1866 में पेटेंट की अवधि समाप्त होने के बाद कई और निर्माता भी इस क्षेत्र में कूद पड़े और इस वाद्य की बढ़ती लोकप्रियता का फायदा उठाते हुए इसके विभिन्न डिजाइन बाजार में पेश किए। सिंह ने बताया कि सेक्सोफोन की घटती लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि इसे सिखाने वाले टीचर भी बहुत कम उपलब्ध हैं।

ऐडोफे ने दो श्रेणियों में सात-सात प्रकार के सेक्सोफोन का पेटेंट हासिल किया और इन्हें सेना के बैंड को दिया था। सेना के बैंड में ये काफी लोकप्रिय हो गए और आज भी अधिकतर सेनाओं में जो सेक्सोफोन बजाए जाते हैं,वे उन्हीं दो श्रृंखलाओं के डिजाइन पर आधारित होते हैं।

पापुलर म्यूजिक, बिग बैंड, ब्ल्यूज, रॉक एंड रोल, स्का तथा जैज में सेक्सोफोन का अहम स्थान है। सिंह कहते हैं कि जैज जैसे पाश्चात्य संगीत विधाओं में सेक्सोफोन बेहद जरुरी होता है। सेक्सोफोन सीखने वालों की संख्या आज भारत में भले ही कम हो लेकिन सेक्सोफोन संगीत जगत में कितना महत्वपूर्ण स्थान रखता है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि किसी भी जॉज बैंड, सिमफोनिक बैंड और मार्चिग बैंड में इसकी उपस्थिति जरुरी होती है और इसके बिना बैंड को अधूरा माना जाता है। सेक्सोफोन को प्रोत्साहित करने के मकसद से यूरोपीय संगीत जगत में छह नवंबर को हर साल सेक्सोफोन दिवस मनाया जाता है। सिंह ने बताया कि सेक्सोफोन सीखने में भी अधिक लोगों की दिलचस्पी नहीं है। उनके स्कूल में इस समय चार-पांच छात्र ही यह वाद्य यंत्र सीख रहे हैं।

पीतल से निर्मित तुरही नुमा यह वाद्य यंत्र चार प्रकार का होता है जिनमें सोप्रानो, आल्तो, तेनोर तथा बैरिटोन शामिल हैं।

सेक्सोफोन ने संगीत की दुनिया में नया वाद्य यंत्र होने के बावजूद बेहद जल्द अपनी जगह बनाई और इसने कुछ नामी-गिरामी सेक्सोफोन वादक संगीत जगत को दिए जिनमें जॉन कोल्ट्रोन, स्टैन गेट्स, कोलमैन रेनडोल्फ हाकिन्स उर्फ 'हाक', जेम्स मूडी, 'चार्ली' दी बर्ड पार्कर और लेस्टर प्रेज यंग का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।




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