अबतक नहीं बदली किसानों की कहानी

 
Nov 07, 10:56 am

जम्मू [योगिता यादव]। बाबा जित्तो के गुनहगार जब अपने आप को लोहे की सुंगलों से पीटते हुए झिड़ी के मेले में जय बावे की.. कर रहे थे ठीक उसी वक्त कठुआ के हटली गांव का किसान दाता राम आलू के बीज के लिए दर दर भटक रहा था। बाबा जित्तो के आत्म बलिदान के साढ़े पांच सौ साल बाद भी गरीब किसानों की हालत सुधरी नहीं है। बीज, खाद और पानी साल भर बस यही रहती है किसानों की परेशानी।

दाता राम किस्मत को दोष देते हैं कि क्यों उनके माता-पिता ने उनका नाम दाता राम रखा जबकि उनके पास तो अपने परिवार का पेट पालने के लिए भी साधन नहीं है। वे कहते हैं कि आजकल खाली खेती से काम नहीं चलता, कोई दूसरी नौकरी भी होनी चाहिए। पहले बीज के लिए खज्जल खराबी, फिर खाद के लिए। सब कुछ मिल जाए तो ऊपर वाले की मार। कंडी की यही मजबूरियां हैं।

जम्मू-कश्मीर के किसानों ने अभी मध्यप्रदेश के किसानों की तरह आत्महत्या करना शुरू नहीं किया है, लेकिन क्या प्रशासन इसी बात का इंतजार कर रहा है? यह कहना है मढ़ के विधायक चौधरी सुखनंदन का। वह बताते हैं कि गन्दम के लिए डीएपी खाद की जरूरत है। पर किसानों को नहीं मिल रही।

ऐसा नहीं है कि सरकार के पास खाद नहीं है। है, लेकिन उन्होंने श्रीनगर के लिए पहले से ही डम्प करके रख दी है। पिछले महीने भी किसानों को आलू के बीज के लिए हिमाचल और पंजाब का रुख करना पड़ा था।

जिनके पास संसाधन हैं वे पंजाब और हिमाचल का रुख कर सकते हैं। जबकि राज्य के 25 फीसदी किसान ऐसे हैं जिनका स्तर गरीबी रेखा से नीचे का है। उनके पास न संसाधन हैं न सहायता। सबकुछ मिल भी जाए तो पानी की किल्लत सब बर्बाद कर देती है। आरएस पुरा के टेलएंड के गांवों तक तो पानी पहुंच ही नहीं पाता। इनकी फसलें तो अब भी बारिश के लिए आसमान का ही मुंह ताकती हैं।

ऐसा नहीं है कि जम्मू की धरती किसी मायने में कम है। सिर्फ हरित प्रदेश ही नहीं बल्कि कंडी के इलाके भी बहुमूल्य औषधीय पौधों से भरे पड़े हैं। कमी है तो सिर्फ नियोजित कार्य व्यवस्था की।

कृषि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक 80 के दशक में हमने रणबीर बासमती के नाम से बहुत अच्छा चावल इंट्रोड्यूस किया था, लेकिन सरकारी सहायता के अभाव में हम लोग इसे भी कैश नहीं कर पाए। अन्यथा आरएस पुरा और बिश्नाह बासमती में देशभर के बेहतरीन नौ बेल्ट में से एक है।

पिछला मौसम किसानों ने सूखे की मार में गुजार दिया। पर अब तक सूखा राहत कोष नाम की कोई चीज प्रशासन के दिमाग में नहीं आई है। उन्हें उम्मीद है कि सर्दियों में पहाड़ों पर बर्फ पड़ेगी। पहाड़ों की बर्फ अगर कंडी के लिए बौछारें न लाई तो.., इस पर फिलहाल प्रशासन खामोश है।




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