
पश्चिमी चंपारण [संजय कुमार उपाध्याय]। नेपाल में हिमालय से निकल कर बिहार के बेतिया जिला मुख्यालय पश्चिम चंपारण से सौ किलोमीटर दूर बहने वाली एक नदी सोना उगल रही है।
इसे वाल्मीकिनगर के सोनाहां, हरनाटांड़ व रामनगर प्रखंड के दोन इलाकों में कहीं पचनद तो कहीं हरहा के नाम से जाना जाता है। इन दिनों नदी में पानी कम है। हां, घुटने तक। नदी में कुछ लोग मेड़ बना रहे हैं, कुछ बालू और कंक्रीट से सोना निकाल रहे हैं। देखकर आश्चर्य हो रहा है।
सामने खैरहनी दोन के परदेशी महतो, जीतन महतो, महेंद्र महतो, विशुन महतो और जमवंती देवी समेत कई लोग काठ के डोंगा, ठठरा, पाटा और पाटी के साथ नदी की धारा से सोना निकाल रहे हैं। इसी बीच परदेशी महतो जंगली पेड़ जिगरा की छाल के लेप से लबालब सतसाल की लकड़ी पर कुछ बालू और सोना लिए पहुंचे। 'साहब देखिए यह सोना है, यह है बालू।' सोना निकालने की तरकीब क्या है? पूछने पर बताते हैं- पहले नदी में मेड़ बांधते हैं, फिर डोगा लगाते हैं, तब उस पर ठठरा रखते हैं। पत्थर ठठरे के ऊपर, बालू डोगा के अंदर। फिर बालू की धुलाई। तब बालू सतसाल की काली लकड़ी पर, फिर धुलाई, तब जाकर दिनभर में निकलता है एक से दो रत्ती सोना।
इतने पर बात खत्म नहीं होती। इसके आगे जानिए। सतसाल की पटरी से सोने के कण को उठाकर जंगली कोच के पत्ता पर सोहागा के साथ रखते हैं। आग में तपाते हैं। अंत में लकड़ी के कोयले में बांधते हैं, तब जाकर बिक्री लायक होता है यह सोना। दिनभर की कमाई एक से दो रत्ती सोना। यानी बिचौलिए खरीदारों से मिलने वाले दो या ढाई सौ रुपये।
वनवासियों के मुताबिक गांव में ही सेठ-साहूकार मिल जाते हैं। ये लोग जो देते हैं, उतने में बेच देते हैं।
नदी के सोने के ये कण गर्दी दोन, खैरहनी,कमरछिनवा दोन, पिपरहवा, मजुराहा व वाल्मीकिनगर के अलावा कई सीमावर्ती गांवों के लोगों के लिए कुछ माह तक रोजगार देते हैं। लेकिन नदी के सोना उगलने की जानकारी स्थानीय प्रशासन को नहीं है। कोई यह बात बताना भी नहीं चाहता। इस संवाददाता ने जब एसडीएम एनामुलहक को इस बारे में जानकारी दी तो वे भी चौंक गए। उन्होंने कहा कि शीघ्र ही पड़ताल कराई जाएगी।