बढ़ सकती है न्याय और निवेश की उलझन

 
Nov 07, 11:16 pm

नई दिल्ली [माला दीक्षित]। आने वाले दिनों में और भी जज मामलों की सुनवाई से खुद को अलग कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के 21 में से 18 जजों ने शेयर और म्यूचुअल फंड के जरिये कंपनियों में निवेश कर रखा है। इनमें से सात जजों का निवेश तो अंबानी बंधुओं की रिलायंस कंपनी में ही है। अगर कंपनी में निवेश के आधार पर जज ऐसे ही सुनवाई से अलग होते रहे तो कुछ दिनों में सुप्रीम कोर्ट में कारपोरेट मामलों की सुनवाई के लिए जज नहीं मिल सकेंगे। ऐसे में सरकार व सुप्रीम कोर्ट को जल्द ही एक स्पष्ट नीति बनाने को बाध्य होना पड़ सकता है।

पिछले दिनों न्यायमूर्ति आर.वी. रवीन्द्रन ने रिलायंस गैस विवाद की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। उनकी बेटी जिस ला फर्म में काम करती थी वह फर्म मुकेश अंबानी की एक कंपनी को कानूनी सलाह देती है। इसी आधार पर उन्होंने खुद को सुनवाई से अलग किया। हालांकि जस्टिस रवीन्द्रन के पास दोनों अंबानी बंधुओं की कंपनी के शेयर भी हैं, मगर उसकी उन्होंने पहले ही घोषणा कर दी थी। यह बात और है कि अंबानी बंधुओं की पैरवी कर रहे वकीलों ने उनके सुनवाई करने पर ऐतराज नहीं जताया था।

गत बुधवार को न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने बीपीसीएल और रिलायंस के बीच चल रहे एक मुकदमे की सुनवाई से मना कर दिया था। कारण उनकी पत्नी के पास इनमें से एक कंपनी के शेयर थे।

शुक्रवार को न्यायमूर्ति एस.एच. कपाड़िया ने सीसा गोआ कंपनी के अधिग्रहण मामले की सुनवाई से हाथ खींच लिया क्योंकि उनके पास वेदान्ता की सहयोगी कंपनी स्टरलाइट के शेयर हैं और वेदान्ता सीसा गोआ कंपनी की 20 फीसदी हिस्सेदारी खरीद रही है। अगर रुख यही रहा तो बड़ी विकट स्थिति आ जायेगी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के सिर्फ तीन जज- मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन, न्यायमूर्ति एच.एल. दत्तू व न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी - ही ऐसे हैं जिनका शेयर या म्युचुअल फंड में कोई निवेश नहीं है। जस्टिस एच.एस. बेदी ने अपनी संपत्ति की घोषणा नहीं की है। जिन जजों के पास कंपनियों के शेयर हैं वे मामला नहीं सुनेंगे तो पहले से मुकदमों के बोझ तले दबे जजों में से कुछ पर अधिक भार पड़ जायेगा जिससे सुनवाई में देरी होगी और अंतत: असर आम जनता, कंपनी और निवेशकों पर पड़ेगा। ऐसे में वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए जल्दी ही सुप्रीम कोर्ट और सरकार को एक ठोस नीति बनानी पड़ सकती है।

अगर जजों के निवेश का रुझान देखा जाए तो सुप्रीमकोर्ट के सात जजों ने अंबानी बंधुओं की अलग-अलग कंपनियों में निवेश किया है। ज्यादातर निवेश मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज और अनिल अंबानी की रिलायंस कम्युनिकेशन तथा आरएनआरएल में हैं। इसके अलावा शेयर बाजार में निवेश को लेकर अधिकांश जजों की पसंद मेटल, सीमेंट व बैंकिंग क्षेत्र रहे हैं। कुछ जजों ने टेक्सटाइल, केमिकल और एफएमसीजी कंपनियों में अच्छा खासा निवेश कर रखा है।

क्यों अलग हो जाते हैं जज

यह एक सामान्य धारणा है कि अदालत का आदेश जिस कंपनी के पक्ष में होता है, उसके शेयरों का भाव चढ़ जाता है। इसका सीधा फायदा निवेशक को मिलता है। चूंकि फैसला जज सुनाते हैं तो उन पर खुद फायदा लेने का इलजाम लग सकता है और यह इलजाम फैसले को विवादित कर सकता है। पक्षपात के आक्षेप से बचने के लिए न्यायाधीश स्वयं ही सुनवाई से अलग हो जाते हैं।




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