नई दिल्ली [टी. ब्रजेश]। भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते [एफटीए] की गाड़ी को पटरी से उतार कर यूरोपीय संघ [ईयू] ने अमेरिका की ही तर्ज पर संरक्षणवाद का नमूना पेश किया है। वैश्विक आर्थिक संकट के दौर में अपना बाजार खोलने से परहेज कर रहे यूरोपीय मुल्कों ने भारत के साथ सातवें दौर की एफटीए वार्ता को परवान चढ़ने से इसी वजह से रोक दिया। बहाना बनी सामाजिक मुद्दों को वार्ता में शामिल करने की वही तीन साल पुरानी शर्त। शुक्रवार को दिल्ली में हुए भारत-ईयू के दसवें सम्मेलन में तीन साल से लटकी व्यापारिक संधि के रास्ते में यूरोपीय समुदाय ने बाल और बंधुआ मजदूरी व जलवायु जैसे मुद्दों की रुकावट पैदा कर एफटीए के लिए कुछ समय और ले लिया। ताकि मंदी से उबरने तक यूरोप के बाजार में भारत की पैठ बढ़ने का रास्ता तैयार न हो सके। नतीजतन भारतीय वाणिज्यिक कूटनीतिकारों के पास यह कहने के सिवा और कोई विकल्प नहीं था कि व्यापारिक संधि अगले साल पूरी हो जाएगी।
वैसे यूरोपीय संघ के संरक्षणवादी रवैये का अंदाजा भारतीय कूटनीतिक खेमे को पहले लग गया था। तभी तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने स्वीडिश समकक्ष फ्रेडरिक रेनफेल्ट से मुलाकात में यह कह कर दबाव बनाने से नहीं चूके कि आर्थिक संकट के इस दौर से उबरने के लिए एक-दूसरे के लिए खुला बाजार खूब काम आएगा। मगर यूरोपीय कूटनीतिकार इसे भारत के फायदे को ध्यान में रख कर दिया गया बयान मान रहे थे। 'दैनिक जागरण' से बातचीत में बेल्जियम के एक अधिकारी ने कहा भी, 'भारत के निर्यात में से करीब 25 फीसदी का ठिकाना तो अकेले यूरोपीय बाजार हैं। यही नहीं, ईयू भारत के लिए सबसे बड़ा निवेशक है।' इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भारत में आने वाले विदेशी निवेश का 65 फीसदी [2007 के आंकड़ों के मुताबिक] तो यूरोप से ही आता है। यानी एफटीए का बड़ा फायदा भारत को होना शुरू हो जाता जो यूरोप की आर्थिक सेहत के लिए फिलहाल ठीक नहीं होता। शायद भारत की दवाओं को यूरोप में हाल ही में इस वजह से भी रोका गया था।
सूत्रों के अनुसार यूरोपीय संघ अभी भारत को अपने बाजार में पैठ बढ़ाने की अनुमति नहीं देना चाहता है। यूरोपीय कूटनीतिकारों का मानना था कि ऐसे समय एफटीए के जरिये भारत को यह मौका मिल सकता था, जबकि उनकी नजरों में वक्त का तकाजा है कि यूरोपीय संघ में संरक्षणवाद का ही रवैया रखा जाए। इसी वजह से रेनफेल्ट ने तो भारत पहुंचते ही कह दिया था कि एफटीए की संभावना कतई नहीं है। ईयू के प्रमुख देश स्वीडन के नेता अपने साथ सामाजिक मुद्दों का कूटनीतिक अस्त्र जो लेकर आए थे। उन्होंने कह दिया कि श्रम और जलवायु जैसे सामाजिक मसलों पर मतभेद मिटाए बगैर बातचीत आगे नहीं बढ़ सकती। यानी भारतीय कूटनीतिकार अगर इसे सत्ताइस देशों के यूरोपीय संघ को भी अमेरिकी संरक्षणवाद का छूत लगने का नतीजा बता रहे हैं तो गलत नहीं कर रहे हैं।
कहा जाए तो तीन साल पहले शुरू हुए भारत-ईयू एफटीए वार्ता के सातवें दौर का ऐसा अंत भविष्य में किसी अच्छी शुरुआत का संकेत नहीं दे रहा है। यूरोपीय संघ [ईयू] के साथ व्यापारिक संधि से पहले की अंतिम औपचारिकता पूरी करना तो दूर, अभी वार्ता का ही पूरा स्वरूप ठीक से तय नहीं हो पाया है।