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अब नजर माओवादियों के बाकी बचे नेताओं पर

Jan 01, 05:30 am
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नई दिल्ली। आजाद और किशनजी के मारे जाने के बाद सुरक्षाबलों की नजर अब माओवादियों के बाकी बचे बडे़ नेताओं पर है और सरकार ने सुरक्षा एजेंसियों से नक्सलियों के नेतृत्व की पूरी तरह घेराबंदी कर उनके हिंसक अभियान को पंगु बनाने के लिए कहा है।

सुरक्षा एजेंसियों से जुडे़ एक अधिकारी ने बताया कि नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में केंद्र सरकार का नया मंत्र है, माओवादी नेताओं की पूरी तरह घेराबंदी की जाए। उन्होंने कहा कि यह अवधारणा दरअसल आध्र प्रदेश से आई है, जिसने नक्सलियों से निपटने के लिए उनके नेताओं को लक्ष्य बनाया। अब केंद्र सरकार ने भी अर्धसैनिक बलों के प्रमुखों से कहा है कि वे नक्सलियों के नेतृत्व से जुडे़ ढाचे को समझें और फिर वाम उग्रवादियों के अभियान को पंगु बनाने के लिए कार्रवाई करें।

नक्सलियों के खिलाफ विभिन्न राज्यों में चल रहे अभियान में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल प्रमुखता से शामिल है। नक्सल प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ के 70 हजार से अधिक जवान तैनात हैं। समझा जाता है कि केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने हाल ही में सीआरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत के दौरान कहा कि कैडर तो एक दिन में तैयार हो सकता है लेकिन नेता एक दिन में नहीं बनता इसलिए अर्धसैनिक बलों को पश्चिम बंगाल के किशनदा, झारखड के कुंदन पहान और उड़ीसा के एस एस पाडा जैसे नक्सल नेताओं को पकड़ना चाहिए।

सूत्रों ने बताया कि सीआरपीएफ अधिकारियों के साथ बैठक में चिंदबरम ने कहा कि जनता के बीच विश्वास का माहौल बनाकर माओवादियों की गतिविधियों को पूरी तरह ठप करने की कोशिश होनी चाहिए। गृह मंत्री ने नक्सलियों से निपटने के लिए आंध्र प्रदेश माडल को सही ठहराते हुए कहा कि राज्य पुलिस ने नक्सल संगठनों के वरिष्ठ नेताओं को निशाने पर लिया था।

अधिकारी ने कहा कि नक्सल प्रभावित राज्यों में कुल मिलाकर हिंसा का स्तर कम हुआ है। छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में हालात सुधरे हैं तो झारखड और महाराष्ट्र में नक्सल हिंसा बढ़ी है जबकि बिहार और उड़ीसा में यथास्थिति है।

उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में हालात सुधरे हैं लेकिन बस्तर क्षेत्र अभी भी काफी संवेदनशील है क्योंकि यह जगह माओवादियों की गतिविधि का केंद्र है। ओडिशा में मल्कानगिरी और कोरापुट नक्सलियों के प्रभुत्व वाले इलाके हैं जबकि पश्चिम बंगाल के जंगलमहल में भी नक्सल हावी हैं।

अधिकारी ने कहा कि 2011 में नक्सल सीआरपीएफ से केवल पाच हथियार ही हासिल कर पाए। यह आकडा हालाकि पिछले 20 साल में सबसे कम है। माओवादियों के खिलाफ अभियान में नक्सलियों के हाथों पिछले साल सीआरपीएफ के 29 जवान शहीद हुए। यह आकडा भी 25 साल में सबसे कम है। इससे पहले 1986 में सीआरपीएफ के 15 जवान नक्सल हमले में शहीद हुए थे।

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